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पॉवेल के इस्तीफे का अर्थ

Tue, 01 Apr 2014 07:37 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Tue, 01 Apr 2014 07:37 PM IST
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meaning of powell's resignation

टिमोथी रोमर के त्यागपत्र देने के करीब तीन साल बाद भारत स्थित अमेरिकी राजदूत नैंसी जे पॉवेल का इस्तीफा महज संयोग नहीं है, बल्कि इसे दोतरफा रिश्तों में पैदा हुई खटास की कड़ी के रूप में देखना उचित होगा। रोमर का इस्तीफा भारतीय वायुसेना के लिए विमानों की खरीद में अमेरिकी कंपनी के पिछड़ जाने के बाद हुआ था। जबकि पॉवेल के इस्तीफे के पीछे देवयानी खोबरागड़े मामले से लेकर नरेंद्र मोदी के प्रति उनकी उदासीनता को कारण बताया जा रहा है।

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नरेंद्र मोदी के प्रति अमेरिका का रुख बेशक ब्रिटेन, कनाडा और यूरोपीय संघ की तुलना में कठोर है, पर इसके लिए सिर्फ पॉवेल जिम्मेदार नहीं हो सकतीं। मानना मुश्किल है कि अमेरिका अपनी विदेशी नीति एक राजनयिक के नजरिये पर तय करेगा। फिर पॉवेल की तो विगत फरवरी में मोदी से मुलाकात भी हुई थी; विगत दिसंबर में खुद मोदी ने ही उनसे मिलने से मना कर दिया था।
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हां, देवयानी खोबरागड़े के मामले में अमेरिका के संवेदनहीन रवैये के लिए नैंसी पॉवेल सर्वाधिक जिम्मेदार रही हैं, और उनकी विदाई के पीछे यह जरूर एक वजह हो सकती है। खोबरागड़े की गिरफ्तारी और उनकी घरेलू नौकरानी के प्रति अमेरिकी सदाशयता का यहां शीर्ष नौकरशाही में ऐसा विरोध हुआ कि अमेरिकी राजनयिकों की सहूलियत कम करने से लेकर अमेरिकी दूतावास के स्कूल से टैक्स चोरी का जवाब मांगने, ड्यूटी फ्री सामान की बिक्री रोकने और अमेरिकी क्लब की शाही सुविधाएं बंद करने का दबाव बनाया गया।
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यह आपसी रिश्ते में आए गतिरोध का ही सूचक है कि भारत न सिर्फ यूक्रेन मामले में रूस के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र महासभा की वोटिंग में गैरहाजिर रहा, बल्कि उसने तमिलों के खिलाफ श्रीलंका सरकार की निरंकुश कार्रवाइयों के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भी वोट नहीं डाला, जबकि इससे पहले दो बार उसने अमेरिकी दबाव में श्रीलंका के खिलाफ वोटिंग की थी।


यानी लगभग चार साल पहले बराक ओबामा ने जिस भारत-अमेरिका रिश्ते को 'इक्कीसवीं सदी की साझेदारी' बताया था, वह फिलहाल अपने कठिनतम दौर में है। और पॉवेल की विदाई के पीछे अमेरिका का संदेश यही है कि वह भारत में चुनाव के बाद बनने वाली नई सरकार से बेहतर रिश्ता कायम करना चाहेगा।

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