आईपीएल के गुरु
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इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के पिछले सत्र के दौरान हुई स्पॉट फिक्सिंग और मैच फिक्सिंग की जांच करने वाले जस्टिस मुकुल मुदगल की रिपोर्ट से उन आरोपों की ही पुष्टि हुई है, जिसमें चेन्नई सुपर किंग्स के मालिक और बीसीसीआई के अध्यक्ष एन श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मयप्पन सहित अनेक लोगों पर उंगली उठाई गई थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से गठित जस्टिस मुदगल कमेटी की रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि कभी भद्र लोगों का खेल समझे जाने वाले क्रिकेट को दागदार बनाने में उन्हीं लोगों का हाथ है, जिनके हाथ में इस खेल की कमान है।
दरअसल इसके पीछे एक बड़ा गठजोड़ काम कर रहा है, जिसके तार दूर-दूर तक फैले हैं। मसलन, मयपन्न के मामले को ही लें, तो उनकी संदिग्ध भूमिका की जांच करना न तो आईसीसी और बीसीसीआई जैसी क्रिकेट की दो सर्वोच्च संस्थाओं की भ्रष्टाचार विरोधी संस्थाओं ने जरूरी समझा और न ही चेन्नई पुलिस ने। यही नहीं, राजस्थान रॉयल्स के मालिक राज कुंद्रा की सट्टेबाजी में संलिप्तता के आरोपों की भी ठीक से जांच नहीं की गई। और चिंता की बात यह भी है कि अपुष्ट जानकारियां भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को भी शक के घेरे में ले रही हैं।
दूसरी ओर क्रिकेट की इस गिरती साख से उन लोगों के उत्साह में कोई फर्क नहीं पड़ रहा, जो इस खेल से मोटी रकम कमा रहे हैं, जैसा कि अभी सातवें सत्र की नीलामी के दौरान देखा गया। युवराज सिंह को 14 करोड़ रुपये में खरीदने वाले विजय माल्या की यह टिप्पणी वाकई गौर करने लायक है कि 'ऐसा (घोटाले) तो हर खेल में होता है'।
यह विडंबना ही है कि जिस क्रिकेट ने सचिन तेंदुलकर के रूप में खेलों के क्षेत्र में पहला 'भारत रत्न' दिया, वह सट्टेबाजी और फिक्सिंग जैसे विवादों में उलझता जा रहा है। दरअसल इसकी एक बड़ी वजह इससे जुड़ा पैसा और ग्लैमर है, जिसने आईपीएल के नाम पर इस खेल को मनोरंजन और सट्टेबाजी के धंधे में बदल दिया है। हैरत नहीं होनी चाहिए कि आईपीएल ब्रांड आज 20 हजार करोड़ रुपये के आसपास का हो गया है!
जाहिर है, इसमें बहुतों के दांव लगे हुए हैं, जो अनैतिकता की हद तक जाकर इस खेल से कमाना चाहते हैं। बेशक आईपीएल ने बहुत से युवा खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा दिखाने और निखारने के मौके दिए हैं, लेकिन इससे भारतीय क्रिकेट को कोई लाभ मिल रहा हो, ऐसा लगता नहीं।