तेल की धार पर फिसले बाजार
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साढ़े पांच साल के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था के दरवाजे पर दस्तक देती मंदी की आशंका ने दुनियाभर के बाजारों को हिला दिया है। इसका असर भारत तक में दिखा है, जिससे बड़े सुधारों की दिशा में कदम बढ़ाने को बेताब मोदी सरकार के इरादों को झटका लग सकता है। मोदी की अगुआई में एनडीए के सत्ता में आने के बाद से बाजार का रुख बेहद सकारात्मक रहा है, यहां तक कि मुंबई शेयर बाजार का सेंसेक्स 28 हजार के आंकड़े तक को पार कर गया था। मगर मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल के दाम के 50 डॉलर प्रति बैरल से नीचे चले जाने के बाद मुंबई शेयर बाजार तकरीबन 900 अंक नीचे गिरकर 27 हजार से नीचे चला गया, हालांकि बुधवार को इसमें मामूली गिरावट दर्ज की गई है।
दरअसल मुंबई शेयर बाजार में बड़ी हिस्सेदारी विदेशी संस्थागत निवेशकों की होती है, जिनसे मोदी सरकार को भी बड़ी उम्मीदें रही हैं। लेकिन वैश्विक बाजार में तेल को लेकर जैसी मार मची है, उससे भारत में निवेश का प्रभावित होना स्वाभाविक है। मांग से अधिक उत्पादन होने के कारण पैदा हुई यह स्थिति जल्द सुधरती भी नहीं दिख रही है। वास्तव में पश्चिम एशिया से लेकर ब्राजील और रूस से लेकर अमेरिका तक जितने भी तेल उत्पादक क्षेत्र हैं, वहां मांग से अधिक उत्पादन की स्थिति है। हालत यह है कि तेल का दूसरा बड़ा खरीदार चीन भी सुस्त पड़ा हुआ है, जिसका असर पूरे बाजार पर होना स्वाभाविक है।
असल में तेल वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जिसके दाम गिरने से तेल उत्पादक देशों के राजस्व पर असर पड़ रहा है। अमूमन तेल के दाम गिरना भारत के लिए अच्छा होता है, मगर तभी तक, जब तक कि इसका असर निवेश पर न पड़े। भारत के वित्तीय घाटे के बढ़ने की बड़ी वजह पेट्रोलियम उत्पाद को माना जाता है, क्योंकि देश को अपनी जरूरत का 75 फीसदी तेल आयात करना पड़ता है। जाहिर है, तेल के दाम गिरने से वित्तीय घाटे को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। मगर यह खेल दुधारी तलवार की तरह है, क्योंकि तेल की लड़ाई में अमेरिका जैसी दिग्गज अर्थव्यवस्था भी उलझी हुई है, जिसका असर वैश्विक निवेश पर पड़ रहा है। जहां तक भारत की बात है, तो यदि स्थिति जल्द नहीं सुधरी, तो इसका असर अगले महीने पेश होने वाले बजट पर पड़ सकता है, जोकि मोदी सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी।