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माओवादियों की बर्बरता

Fri, 11 Jan 2013 10:41 PM IST
Updated Fri, 11 Jan 2013 10:41 PM IST
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maoist brutality

राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहे झारखंड के लातेहार में माओवादियों के ताजा हमले ने नक्सलियों की बढ़ती ताकत और उनकी बदलती रणनीति के साथ ही सुरक्षा बलों की बेबसी को भी उजागर किया है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि यदि समय रहते शहीद जवान के शरीर के भीतर लगाए गए विस्फोटकों का पता न चलता, तो कितना नुकसान हो सकता था।

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वैसे भी छह जनवरी के हमले में जो चार नागरिक मारे गए, वह माओवादियों द्वारा शहीद जवानों के शरीर से बांधे गए विस्फोटकों का ही नतीजा था। ऐसा भी लगता है कि सुरक्षा बलों ने अतीत से कोई सबक नहीं लिया है। लातेहार के जंगलों में सीआरपीएफ और झारखंड जगुआर के जवान ऊंची पहाड़ी पर घात लगाए नक्सलियों से ठीक उसी तरह घिर गए, जिस तरह अप्रैल, 2010 में दंतेवाड़ा के जंगलों में 76 जवान तीन तरफ से घिरने के बाद नहीं बच पाए थे।
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नक्सली हमलों के बाद हर बार यह बात भी सामने आती है कि सीआरपीएफ और राज्य पुलिस के जवानों के बीच समन्वय नहीं था या जवानों को इलाके की भौगोलिक स्थिति का ठीक से पता नहीं था, मगर उसके बाद जमीनी स्तर पर किसी तरह का बदलाव नजर नहीं आता। प्रधानमंत्री बार-बार भले ही यह कह रहे हों कि माओवादी देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं, पर वास्तव में यह अकेला हमला यह बताने के लिए काफी है कि न तो केंद्र और राज्य सरकारों तथा सुरक्षा बलों को माओवादियों की ताकत का ठीक से अंदाजा है और न ही उनकी रणनीतियों का।
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वर्ष 2004 में एमसीसी और पीपुल्स वार के विलय के बाद बनी माओवादी पार्टी ने सिर्फ अपना नाम ही नहीं बदला, बल्कि रणनीति भी बदली है, जैसा कि पता चला है कि इसे एक महिला नक्सली की अगुआई में अंजाम दिया गया। यही नहीं, जो विस्फोटक बरामद किए गए हैं, उनके पाकिस्तान में बनाए जाने के सुबूत मिले हैं। इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है, क्योंकि पहले भी माओवादियों के पाकपरस्त संगठनों, पूर्वोत्तर के अलगाववादी संगठनों और नेपाल के माओवादियों के साथ रिश्ते की बात उजागर हो चुकी है। इसे भारत को अस्थिर करने की कोशिशों की तरह क्यों नहीं देखा जाना चाहिए? अचरज की बात यह भी है कि माओवादियों के खिलाफ सुरक्षा बलों की कार्रवाई को लेकर हमेशा शोर मचाने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ता और गैर सरकारी संगठन उनकी बर्बरता को लेकर खामोश हैं!

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