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बदलाव का जनादेश
नई दिल्ली
Updated Sun, 19 Oct 2014 08:12 PM IST
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महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों में भाजपा का सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आना बताता है कि लोकसभा चुनाव के करीब पांच महीने बाद भी मतदाताओं के बीच नरेंद्र मोदी का प्रभाव कमोबेश बरकरार है। हालांकि अति आत्मविश्वास के साथ शिवसेना से पच्चीस साल पुराना गठबंधन तोड़ नरेंद्र मोदी की रैलियों के सहारे महाराष्ट्र में अपने बूते सरकार बनाने का भाजपा का सपना जिस तरह टूटा है, वह देखने लायक है।
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पर यह नतीजा उससे भी अधिक उन उद्धव ठाकरे के अहंकार और महत्वाकांक्षा के धूल-धूसरित होने का उदाहरण है, जिन्होंने भाजपा से अलग होने के बाद इस चुनाव को महाराष्ट्र की एकता और अस्मिता का भावुक मुद्दा बना डाला था। बल्कि इसके साथ मनसे के पराभव को भी जोड़ लें, तो यह ठाकरे बंधुओं के लिए चेतावनी है कि खुले चुनाव में क्षेत्रवाद की आक्रामक राजनीति उनका नुकसान ही करेगी।
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एनसीपी ने हालांकि भाजपा को बाहर से समर्थन देने का ऐलान कर स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस से अलग होने का फैसला उसने यों ही नहीं लिया था, पर चुनावी नतीजे बताते हैं कि उस गठजोड़ के खिलाफ महाराष्ट्र में वैसी सत्ता-विरोधी लहर भी नहीं थी, जैसी बताई जा रही थी। नरेंद्र मोदी के सघन प्रचार के बावजूद कांग्रेस और एनसीपी आखिर अस्सी से अधिक सीटें ले ही आई हैं। अलबत्ता हरियाणा में शानदार जीत जरूर भाजपा की विराट उपलब्धि है। जिस राज्य में भाजपा ने सहयोगियों के बगैर चुनाव नहीं लड़ा हो, और साथ लड़ते हुए भी जिसका प्रदर्शन बहुत उत्साहनजक नहीं रहा हो, वहां अकेले दम पर सभी सीटों पर चुनाव लड़कर सरकार बनाने के लिए पर्याप्त सीटें जीतकर आना कोई छोटी-मोटी उपलब्धि नहीं है।
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बेशक हरियाणा में कांग्रेस की पराजय के पीछे उसकी खराब छवि और सत्ता-विरोधी लहर जिम्मेदार है, लेकिन मोदी और भाजपा के पक्ष में बने माहौल का प्रमाण यही है कि मुख्यमंत्री का चेहरा सामने न रखकर भी पार्टी ने यहां शानदार जीत हासिल कर ली है। इनेलो प्रमुख का जमानत पर बाहर आकर चुनावी रैली करना भी काम नहीं आया। हरियाणा का चुनावी नतीजा उन वंशवादी स्थानीय पार्टियों के लिए चेतावनी है, जो अपने भ्रष्टाचरण पर पर्दा डालने के लिए जातिवाद और क्षेत्रवाद का सहारा लेने से भी गुरेज नहीं करतीं। हरियाणा के मतदाताओं ने इस तरह की राजनीति को नकार कर बदलाव के पक्ष में वोट दिया है। लिहाजा उनकी उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए भाजपा को भ्रष्टाचार मुक्त पारदर्शी प्रशासन पर जोर देना होगा।