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पछवा से कम हुआ मलेरिया का प्रकोप
अमर उजाला ब्यूरो/ रोहतक
Updated Tue, 30 Sep 2014 02:48 AM IST
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पिछले करीब 10 दिन से चल रही पछवा ने बीमारियों से राहत दिलाने में स्वास्थ्य विभाग की मदद की है।
खेत और खाली प्लाटों में जमा गंदा पानी पछवा की वजह से सूखने लगा है। विभाग के मुताबिक पिछले 15 दिनों से मलेरिया का कोई केस नहीं आया है। इस साल केसों की संख्या फिलहाल 51 ही है, पिछले साल अब तक ऐसे केसों की संख्या 145 थी।
मौसम वैज्ञानिकों की मानें तो पछवा हवा के दौरान बीमारियां होने की आशंकाएं कम हो जाती हैं। कारण यह हवा नमी को सोख लेती है। नमी के कारण ही अधिकतर बीमारियां होती हैं।
इस समय खेत और शहर की कॉलोनियों में खाली पड़े प्लाटों में पानी जमा है। पछवा चलने से यह पानी तेजी से सूख रहा है। हवा के कारण गंदे पानी में मादा एनीफीलिज का लारवा तैयार नहीं हो पा रहा है। बात सुनने में भले ही अटपटी लगे।
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लेकिन स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी भी इस बात को मानते हैं कि पछवा के बहाव के कारण विभाग की परेशानी आधी कम हो जाती है, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है विभाग अपना अभियान रोक दे। लारवा पर काबू पाने के लिए विभाग भी कमर कसे हुए है।
यह है वैज्ञानिक तर्क
वैज्ञानिक तर्क यह है कि पछवा को निरोगी हवा का नाम भी दिया गया है। इस हवा में मच्छर मक्खी के अलावा तमाम तरह के कीटाणुओं की संख्या कम हो जाती है। चिकित्सक पछवा को एंटीबायटिक का नाम भी देते हैं। पछवा का बहाव मरीज के घाव को जल्द सुखा देता है। इस हवा से नमी कम हो जाती है। जिस कारण उमस से राहत मिलती है।
पड़ता है प्रभाव
पछवा हवा का वातावरण पर काफी प्रभाव पड़ता है। इससे वातावरण में व्याप्त कीटाणुओं की संख्या कम हो जाती है, जिससे बीमारियां भी कम होती हैं। मच्छर कम होते हैं। जिससे मलेरिया के केस भी कम होते हैं। यह बात सही है कि पिछले 15 दिन में मलेरिया का कोई भी नया केस नहीं आया है। इसे लेकर विभाग भी गंभीर है।
डा. शिव कुमार, जिला सिविल सर्जन रोहतक।
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खेत और खाली प्लाटों में जमा गंदा पानी पछवा की वजह से सूखने लगा है। विभाग के मुताबिक पिछले 15 दिनों से मलेरिया का कोई केस नहीं आया है। इस साल केसों की संख्या फिलहाल 51 ही है, पिछले साल अब तक ऐसे केसों की संख्या 145 थी।
मौसम वैज्ञानिकों की मानें तो पछवा हवा के दौरान बीमारियां होने की आशंकाएं कम हो जाती हैं। कारण यह हवा नमी को सोख लेती है। नमी के कारण ही अधिकतर बीमारियां होती हैं।
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इस समय खेत और शहर की कॉलोनियों में खाली पड़े प्लाटों में पानी जमा है। पछवा चलने से यह पानी तेजी से सूख रहा है। हवा के कारण गंदे पानी में मादा एनीफीलिज का लारवा तैयार नहीं हो पा रहा है। बात सुनने में भले ही अटपटी लगे।
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लेकिन स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी भी इस बात को मानते हैं कि पछवा के बहाव के कारण विभाग की परेशानी आधी कम हो जाती है, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है विभाग अपना अभियान रोक दे। लारवा पर काबू पाने के लिए विभाग भी कमर कसे हुए है।
यह है वैज्ञानिक तर्क
वैज्ञानिक तर्क यह है कि पछवा को निरोगी हवा का नाम भी दिया गया है। इस हवा में मच्छर मक्खी के अलावा तमाम तरह के कीटाणुओं की संख्या कम हो जाती है। चिकित्सक पछवा को एंटीबायटिक का नाम भी देते हैं। पछवा का बहाव मरीज के घाव को जल्द सुखा देता है। इस हवा से नमी कम हो जाती है। जिस कारण उमस से राहत मिलती है।
पड़ता है प्रभाव
पछवा हवा का वातावरण पर काफी प्रभाव पड़ता है। इससे वातावरण में व्याप्त कीटाणुओं की संख्या कम हो जाती है, जिससे बीमारियां भी कम होती हैं। मच्छर कम होते हैं। जिससे मलेरिया के केस भी कम होते हैं। यह बात सही है कि पिछले 15 दिन में मलेरिया का कोई भी नया केस नहीं आया है। इसे लेकर विभाग भी गंभीर है।
डा. शिव कुमार, जिला सिविल सर्जन रोहतक।