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मादा हारमोन की गंध के जाल में कैद होंगे नर कीट
रोहतक
Updated Fri, 25 Apr 2014 02:41 AM IST
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बेल और पौधों पर लगी सब्जी और फलों को खतरनाक कीटों से बचाने के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने अनोखा प्रयोग किया है। इन कीटों को बिना मारे और नष्ट किए ही फलों को बचाया जाएगा। इसके लिए खेतों में फिरोमोन ट्रेप बिछाया जाएगा, जिसमें मादा कीट के हारमोन की गंध होगी। गंध में वशीभूत होकर नर कीट ट्रेप में आ जाएगा और यहीं कैद होकर रह जाएगा। बाद में ट्रेप से कीटों को निकालकर खेतों से बाहर फेंक दिया जाएगा।
जिले में इस समय गेहूं की कटाई का काम समाप्त होने के कगार पर है। सरसों पहले की मंडियों में पहुंच चुकी है। अब किसानों के खेतों में टमाटर, खीरा, ककड़ी और घीया की फसल खड़ी है। ऐसे में वातावरण में मौजूद कीटों की नजर इन्हीं फसलों पर है। आमतौर पर इन फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों का नष्ट करने के लिए किसानों को कई तरह की दवाओं का छिड़काव करना पड़ता है।
इससे किसानों का समय और पैसा दोनों नष्ट होते हैं। दूसरी तरफ कीट नाशकों का फसल पर भी काफी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कई बार कीट नाशकों का अधिक प्रयोग करने से किसानों की फसल भी बर्बाद हो जाती है। चूंकि टमाटर, खीरा, ककड़ी और घिया आदि का प्रयोग नियमित रूप से होता है।
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इसलिए कृषि वैज्ञानिक भी इन फसलों में अधिक कीट नाशकों के प्रयोग की सलाह नहीं देते। बस, इन्हीं सब बातों से बचने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने इस नई विधि को खोज निकाल डाला।
यह हारमोन हिमाचल प्रदेश की एक लैब में तैयार किया गया है। हैरानी की बात तो यह है कि हारमोन तैयार करने में मामूली सा ही खर्च आया है। एक एकड़ में लगने प्रयोग होने वाले हारमोन मात्र एक हजार रुपये में तैयार हो गए हैं। हालांकि किसानों को यह हारमोन मुफ्त दिए जा रहे हैं।
ट्रेप का पूरा खर्च विभाग की वहन कर रहा है। फिलहाल विभाग ने 10 एकड़ के लिए हारमोन मंगाए हैं। जो किसानों को जरूरत के हिसाब से वितरित किए जा रहे हैं। जिले के कंसाला, भैंसरू और भालौठ में इन फसलों की खेती अधिक है।
हारमोन को खाली प्लास्टिक की बोतल में बंद किया गया है। इस पर पीले रंग का पेपर लपेटा गया है। इस बोतल को डंडे के सहारे खेत के बीचों बीच बांध दिया जाता है। बांधने के बाद पीले पेपर को हटा दिया जाता है। हारमोन की गंध बाहर जाने और कीटों के प्रवेश के लिए बोतल के ऊपरी भाग में एक छेद छोड़ दिया जाता है। एक एकड़ में केवल दस ट्रेप लगाने से ही काम चल जाता है।
जिले के किसान इस नए प्रयोग से काफी खुश हैं। उन्हें इसका लाभ भी मिल रहा है। प्रयोग के तौर पर केवल 10 एकड़ फसल के लिए ही ट्रेप मंगाए गए थे। जो हाथों-हाथ उठ गए हैं। लैब से और ट्रेप मंगवाने के आर्डर भेज दिए गए हैं। इससे किसानों का समय और धन दोनों ही मिल रहा।
उन्हें बाजार में भी अच्छी कीमत मिल रही है। यह प्रयोग किसानों के लिए दोहरा फायदा देने वाला साबित हो रहा है।
बीपी राणा, पौध रोग विशेषज्ञ, कृषि विज्ञान केंद्र रोहतक।
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जिले में इस समय गेहूं की कटाई का काम समाप्त होने के कगार पर है। सरसों पहले की मंडियों में पहुंच चुकी है। अब किसानों के खेतों में टमाटर, खीरा, ककड़ी और घीया की फसल खड़ी है। ऐसे में वातावरण में मौजूद कीटों की नजर इन्हीं फसलों पर है। आमतौर पर इन फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों का नष्ट करने के लिए किसानों को कई तरह की दवाओं का छिड़काव करना पड़ता है।
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इससे किसानों का समय और पैसा दोनों नष्ट होते हैं। दूसरी तरफ कीट नाशकों का फसल पर भी काफी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कई बार कीट नाशकों का अधिक प्रयोग करने से किसानों की फसल भी बर्बाद हो जाती है। चूंकि टमाटर, खीरा, ककड़ी और घिया आदि का प्रयोग नियमित रूप से होता है।
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इसलिए कृषि वैज्ञानिक भी इन फसलों में अधिक कीट नाशकों के प्रयोग की सलाह नहीं देते। बस, इन्हीं सब बातों से बचने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने इस नई विधि को खोज निकाल डाला।
यह हारमोन हिमाचल प्रदेश की एक लैब में तैयार किया गया है। हैरानी की बात तो यह है कि हारमोन तैयार करने में मामूली सा ही खर्च आया है। एक एकड़ में लगने प्रयोग होने वाले हारमोन मात्र एक हजार रुपये में तैयार हो गए हैं। हालांकि किसानों को यह हारमोन मुफ्त दिए जा रहे हैं।
ट्रेप का पूरा खर्च विभाग की वहन कर रहा है। फिलहाल विभाग ने 10 एकड़ के लिए हारमोन मंगाए हैं। जो किसानों को जरूरत के हिसाब से वितरित किए जा रहे हैं। जिले के कंसाला, भैंसरू और भालौठ में इन फसलों की खेती अधिक है।
हारमोन को खाली प्लास्टिक की बोतल में बंद किया गया है। इस पर पीले रंग का पेपर लपेटा गया है। इस बोतल को डंडे के सहारे खेत के बीचों बीच बांध दिया जाता है। बांधने के बाद पीले पेपर को हटा दिया जाता है। हारमोन की गंध बाहर जाने और कीटों के प्रवेश के लिए बोतल के ऊपरी भाग में एक छेद छोड़ दिया जाता है। एक एकड़ में केवल दस ट्रेप लगाने से ही काम चल जाता है।
जिले के किसान इस नए प्रयोग से काफी खुश हैं। उन्हें इसका लाभ भी मिल रहा है। प्रयोग के तौर पर केवल 10 एकड़ फसल के लिए ही ट्रेप मंगाए गए थे। जो हाथों-हाथ उठ गए हैं। लैब से और ट्रेप मंगवाने के आर्डर भेज दिए गए हैं। इससे किसानों का समय और धन दोनों ही मिल रहा।
उन्हें बाजार में भी अच्छी कीमत मिल रही है। यह प्रयोग किसानों के लिए दोहरा फायदा देने वाला साबित हो रहा है।
बीपी राणा, पौध रोग विशेषज्ञ, कृषि विज्ञान केंद्र रोहतक।