फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Other Archives ›   Maggie's scourge

आफत की मैगी

Wed, 03 Jun 2015 08:25 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Wed, 03 Jun 2015 08:25 PM IST
विज्ञापन
Maggie's scourge

बच्चों, युवाओं और कामकाजी लोगों में इंस्टेंट फूड के तौर पर मैगी ने जो जगह वर्षों में बनाई थी, वह जगह पिछले कुछ ही दिनों में उसने अगर कमोबेश खो दी है, तो इसके लिए सबसे अधिक जिम्मेदार उसकी उत्पादक कंपनी ही है, जो अब भी अपने उत्पाद को सही बताते हुए अड़ी हुई है। जबकि एक के बाद एक राज्य में मैगी के नमूने फेल होने के बाद न सिर्फ उस पर प्रतिबंध का दायरा बढ़ता जा रहा है, बल्कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की भी स्वाभाविक ही मांग की जा रही है।

विज्ञापन


जो मैगी बच्चों में ज्यादा लोकप्रिय है, उसमें सीसा और मोनो सोडियम ग्लूटामेट (एमएसजी) जैसे हानिकारक पदार्थों की मौजूदगी सिर्फ चौंकाने वाली नहीं है, यह खुद मैगी के विज्ञापन, 'टेस्ट भी, हेल्थ भी' की धज्जियां भी उड़ाती है। इसलिए मौजूदा मामले में नैतिक रूप से दोषी तो ग्लैमर की दुनिया के वे लोग भी हैं, जिन्होंने इसकी गुणवत्ता परखे बगैर इसका विज्ञापन किया, जो इसके फलते-फूलते बाजार का एक बड़ा कारण रहा।
विज्ञापन


भूमंडलीकरण ने दरअसल हमें जो जीवन-शैली दी है, मैगी कदाचित उसका सबसे सटीक रूपक है; इसका महत्व सिर्फ पैकेज्ड फूड होने के कारण नहीं है, बल्कि इस वजह से है कि इसे बनाने में श्रम नहीं करना पड़ता। इसी कारण इसने बच्चों के टिफिन में जगह बनाई, तो ऑफिस के कैंटीन में भी, और देर रात लौटे कामकाजी युवाओं की भूख मिटाने में भी यह असरदार साबित हुई। पर मैगी की यह सच्चाई कड़े कदम उठाने की मांग करती है, क्योंकि स्वास्थ्य से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। मैगी के इस हश्र के बाद पैकेज्ड फूड के बरक्स परंपरागत खाद्य पदार्थों की ओर लौटने की बहस तेज होगी, इसमें संदेह नहीं।
विज्ञापन
विज्ञापन


लेकिन बढ़ती मांग, घटती उपलब्धता, मुनाफाखोरी की बढ़ती प्रवृत्ति और पर्यावरण के अंधाधुंध शोषण से अनाज, फल और दूध ही भला कितने शुद्ध बचे हैं। इसलिए मुद्दा पारंपरिक भोजन बनाम इंस्टेंट फूड का उतना नहीं है, जितना खाने-पीने की चीजों की सतत जांच और परीक्षण का है। फिर जो खाद्य पदार्थ बच्चों में लोकप्रिय है, उसकी गहन जांच तो और भी जरूरी है। अगर हम पश्चिम का ही उदाहरण लें, तो खान-पान की शुद्धता के जो मानक उन्होंने बना रखे हैं, वे हमसे बहुत उन्नत हैं। हर चीज में पश्चिम की नकल करने वाले हम इस मामले में उनसे कोई सीख क्यों नहीं ले सकते!

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed