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सांच को आंच नहीं
नई दिल्ली
Updated Thu, 28 Nov 2013 08:16 PM IST
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करीब नौ साल पुराने शंकररामन हत्याकांड मामले में कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती और उनके उत्तराधिकारी विजयेंद्र सरस्वती को निर्दोष बताने का अदालती फैसला उन लोगों के लिए राहत की तरह है, जो इसे एक राजनीतिक साजिश मानते रहे हैं।
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तमिल टैब्लॉयड नक्कीरन ने एक मंदिर के प्रबंधक शंकररामन की हत्या में शंकराचार्य और उनके उत्तराधिकारी का हाथ होने का सनसनीखेज खुलासा क्या कर दिया था कि बगैर मामले की गहराई में गए तत्कालीन अन्नाद्रमुक सरकार उनके पीछे ही पड़ गई थी। ठीक दीपावली की रात आंध्र प्रदेश के एक पूजास्थल से शंकराचार्य की गिरफ्तारी जिस अंदाज में की गई थी, वह जयललिता की विद्वेष भरी राजनीति का ही उदाहरण थी।
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सत्ता का साथ देते हुए एक तत्कालीन एसपी, अब दिवंगत, ने तो नियम-कायदे ही ताक पर रख दिए थे, जिसका जिक्र खुद सर्वोच्च न्यायालय ने शंकराचार्य को जमानत देते हुए किया था। यदि अदालत को यह टिप्पणी करनी पड़े कि प्रशासनिक दखल के कारण मामले की समुचित जांच नहीं हो पाई, तो यही अपने आप में साजिश के बारे में बताने के लिए काफी है।
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चूंकि तमिलनाडु में अब उसी अन्नाद्रमुक की सरकार है, लिहाजा उसे इसका जवाब देना ही चाहिए कि अगर शंकराचार्य के खिलाफ पर्याप्त सुबूत थे, तो वे अदालत में टिक क्यों नहीं पाए! उसने तो तब इसका भी ख्याल नहीं रखा था कि इस तरह का अविवेकी कदम उठाकर वह जनभावनाओं के खिलाफ जाने का दुस्साहस कर रही है।
जिस वक्त धर्म और अध्यात्म की धवल परंपरा पर दुर्योग से विवादों के कुछ छींटे पड़ रहे हैं, उस दौर में शंकराचार्य का पाक-साफ साबित होना आश्वस्त तो करता ही है, इसकी जरूरत भी बताता है कि धार्मिक संस्थानों को किसी भी तरह के विवाद से दूर होना चाहिए, क्योंकि इस तरह के विवाद से लोगों की आस्था डिगती है।
उतना ही आवश्यक अब उन शंकररामन के हत्या की सच्चाई सामने आना भी है, जिन्हें अपराध और भ्रष्टाचार के खिलाफ मुंह खोलने की कीमत जान देकर चुकानी पड़ी थी। बल्कि न्याय का तकाजा तो यही है कि जिस जयललिता सरकार ने पहले आनन-फानन में कार्रवाई शुरू की थी, अब वह मामले की तह में जाए और दोषियों को ढूंढकर निकाले।