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कर्ज की जिंदगी
नई दिल्ली
Updated Mon, 06 May 2013 10:59 PM IST
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हमारे देश में सूदखोरों का जाल किस तरह बिछा हुआ है, यह अलीगढ़ की उस घटना से समझा जा सकता है, जहां कर्ज में डूबे एक बढ़ई ने अपनी दो किशोरवय बेटियों के साथ गंगा में कूदकर जान दे दी।
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सूदखोरों के आतंक से वह इस कदर टूट चुका था कि अपने चार बच्चों और पत्नी के साथ जान देना चाहता था; मगर उसका बेटा और छोटी बेटी इसलिए बच गए, क्योंकि उन्हें पहले ही ननिहाल भेज दिया गया था और पत्नी को लहरों ने किनारे ला पटका।
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इस घटना के रोंगटे खड़े कर देने वाले ब्यौरे सामने आए हैं, जिनसे पता चलता है कि उसने दो सूदखोरों से 20-20 हजार रुपये कर्ज लिए थे, जिसके एवज में सवा सौ फीसदी ब्याज तक वसूला गया, उसके बेटे को बंधक बनाकर काम करवाया गया और बची-खुची कसर रोजाना 1,600 रुपये की किश्त के साथ पूरी कर दी गई!
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यह अकेली घटना उन विवशताओं को उजागर करती है, जिनसे देश की एक बड़ी आबादी रोजाना जूझ रही है। कर्ज के दुष्चक्र में फंसकर जान देने वाला धर्मेंद्र अकेला शख्स नहीं है, अलीगढ़ और बुलंदशहर के इलाके में ही निम्न आय वर्ग के न जाने कितने लोग सूदखोरों की शरण में जाने को मजबूर हैं।
इस घटना के बाद डीआईजी का यह बयान तो और भी हैरान करने वाला है कि सूदखोरी के खिलाफ कानून बने हुए हैं और लोग पुलिस में शिकायत कर सकते हैं। क्या दबंग सूदखोरों के खिलाफ रपट लिखाना इतना आसान है?
वास्तव में इस समस्या की जड़ में जाने की जरूरत है कि आखिर ऐसी नौबत क्यों आती है कि लोगों को कुछ हजार रुपये के कर्ज के लिए डेढ़ सौ से दो सौ फीसदी ब्याज देना पड़ता है।
दरअसल इसके पीछे बैंकिंग व्यवस्था की खामियां ही उजागर होती हैं, जो आजादी के पैंसठ वर्ष के बाद भी छोटे कर्ज देने की विश्वसनीय प्रणाली विकसित नहीं कर सकी है।
दूसरी ओर बैंकों के ऐसे कारनामे सामने आ रहे हैं, जिनसे यही धारणा मजबूत होती है कि उन्हें मोटे धन से मतलब है, रुपये के रंग से नहीं, चाहे वह काला हो या सफेद!
मुश्किल यह है कि माइक्रोफाइनेंस की अवधारणा भी कारगर साबित नहीं हुई है। ऐसे में छोटे कर्जदारों के लिए बैंक ही सहारा बन सकते हैं। बैंकिंग सुधार की दिशा में तो यही सबसे पहला कदम होना चाहिए।