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उन्हें स्कूल जाने दें

Thu, 23 Jul 2015 08:25 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 23 Jul 2015 08:25 PM IST
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Let her go school

ऐसे समय, जब पूरे देश में 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' जैसा अभियान चलाया जा रहा है, उत्तर प्रदेश के बरेली के कुछ गांवों की लड़कियों द्वारा छेड़खानी से त्रस्त होकर पढ़ाई छोड़ देने को विवश होने की घटना स्तब्ध करने वाली है। बरेली से महज 45 किलोमीटर दूर शेरगढ़ क्षेत्र की करीब दो सौ लड़कियों की व्यथा सिर्फ यही नहीं है कि उन्हें कई किलोमीटर दूर स्थित स्कूल तक पैदल चलकर जाना होता है, बल्कि बीच में पड़ने वाली एक नदी को भी जुगाड़ से बनाई गई नौका से पार करना पड़ता है!

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पुलिस प्रमुख से लेकर केंद्रीय मंत्री और क्षेत्रीय सांसद संतोष कुमार गंगवार तक पहुंच चुकी उनकी शिकायत के मुताबिक नदी के आसपास ऐसे असामाजिक तत्व होते हैं, जिनसे उन्हें सुरक्षा का खतरा है। हैरानी की बात है कि यह सिलसिला दो वर्ष से चल रहा है और पुलिस से लेकर शिक्षा विभाग तक को इसकी खबर नहीं थी। यदि इन लड़कियों और उनके अभिभावकों ने हिम्मत न दिखाई होती, तो यह मामला सामने ही नहीं आ पाता। पुलिस के आला अधिकारी कह रहे हैं कि केवल कुछ ही लड़कियों ने स्कूल जाना छोड़ा है, वह भी इसलिए, क्योंकि उन्हें नाव से वहां जाना पड़ता है! यदि यही सच है, तब भी क्या यह चिंता का कारण नहीं होना चाहिए कि शिक्षा को घर-घर तक पहुंचाने का दावा करने वाली केंद्र और राज्य की सरकारें लड़कियों के स्कूल जाने तक की व्यवस्था नहीं कर सक रही हैं।
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पहले भी देश के कई हिस्सों से ऐसी खबरें आई हैं कि किस तरह बरसात के मौसम में बच्चों को रस्सी के सहारे नदी-नाले पार कर स्कूल जाना पड़ता है। बेशक, उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों ने स्कूली छात्राओं को साइकिलें देने जैसी लोकप्रिय योजनाएं चलाई हैं, लेकिन यही पर्याप्त नहीं है। वस्तुतः उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में लड़कियों की पढ़ाई सतत जारी रखना अपने आप में एक चुनौती है, जहां 27 फीसदी लड़कियां ही पढ़ाई पूरी कर पाती हैं। दरअसल लैंगिक असमानता दूर करने के लिए व्यापक रणनीति की जरूरत है, जिसमें लड़कियों की शिक्षा को सबसे ऊपर होना चाहिए। इसके साथ ही इस पर भी विचार करने की जरूरत है कि कड़े कानूनों के बावजूद लड़कियों के खिलाफ होने वाले अपराध कम नहीं हुए हैं, जिनसे निपटने के लिए तत्परता की जरूरत है।
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