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आधी नहीं पूरी दुनिया

Thu, 07 Mar 2013 09:36 PM IST
Updated Thu, 07 Mar 2013 09:36 PM IST
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law to prevent sexual harassment of women

महिलाओं के उत्पीड़न को रोकने से संबंधित कानून केंद्रीय मंत्रिमंडल में सहमति नहीं बनने की वजह से लगता नहीं कि जल्द अस्तित्व में आ सकेगा। विधि मंत्रालय को यौन उत्पीड़न की जगह बलात्कार शब्द पर आपत्ति है, तो संसदीय समिति को यौन उत्पीड़न की परिभाषा sपर।

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पिछले वर्ष 16 दिसंबर को राजधानी में पैरामेडिकल छात्रा के साथ हुई बलात्कार की बर्बर घटना के बाद महिला उत्पीड़न, खास तौर से बलात्कार के खिलाफ एक सख्त कानून की न केवल जरूरत महसूस की गई है, बल्कि इसे लेकर देश भर में बहस भी तेज है। यह अलग बात है कि जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नजर नहीं आया है। बीते तीन दिनों के दौरान राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में ही बलात्कार की कई घटनाएं दर्ज की गई हैं।
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ये घटनाएं बताती हैं कि देश भर से उठी आवाजों के बावजूद महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध कम नहीं हुए हैं। महिला उत्पीड़न को रोकने के लिए वाकई एक सशक्त कानून की जरूरत है, मगर यही पर्याप्त नहीं। एसोचैम की एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश की 88 फीसदी महिलाओं को यौन उत्पीड़न, प्रताड़ना और बलात्कार से संबंधित कानूनों की ठीक से जानकारी ही नहीं है, तो राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो का आंकड़ा है कि थानों में दर्ज होने वाले बलात्कार के सिर्फ 26 फीसदी मामलों में ही दोषियों को सजा मिल पाती है।
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सच्चाई यह है कि आर्थिक आत्मनिर्भरता उत्पीड़न या बलात्कार से बचने की गारंटी नहीं है और न ही महिला बैंक जैसे प्रतीकात्मक कदम उठाने से स्थिति बदलने वाली है। महिलाओं के उत्पीड़न पर बात करते हुए समाज में उनकी बदलती हैसियत पर भी गौर करना होगा। ऐसा लगता है कि पुरुष वर्चस्व उनकी इस पहलकदमी को कुबूल नहीं कर पा रहा है! जरूरत इस सोच को भी बदलने की है।


यह क्यों नहीं मानना चाहिए कि जान-बूझकर ही लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का मसला संसद में लटकाए रखा गया है? और क्या संसद में एक-तिहाई महिला सांसद होतीं, तो उनके उत्पीड़न से संबंधित एक मजबूत कानून को पारित करना इतना मुश्किल होता? आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर क्या इन प्रश्नों पर विचार नहीं करना चाहिए, जिसकी इस वर्ष की थीम ही महिला उत्पीड़न रखी गई है।

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