आखिरकार इस्तीफा
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एक गलती शिखर पर पहुंचे व्यक्ति को किस तरह जमीन पर पटक देती है, इसका ताजातरीन नमूना न्यायमूर्ति अशोक कुमार गांगुली हैं, जिन्हें पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद से अंततः इस्तीफा देना पड़ा है। अगर उस लॉ इंटर्न ने अपने साथ किए गए यौन दुर्व्यवहार के बारे में ब्लॉग में न लिखा होता, और सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय समिति ने मामले की जांच के बाद बदसुलूकी करने वाले की पहचान उजागर न की होती, तो बहुत संभव है, होटल की वह कथित अशालीन घटना न्यायमूर्ति गांगुली के ऊंचे कद और रसूख के पीछे हमेशा के लिए छिप जाती।
2 जी मामले में न्यायमूर्ति जी एस सिंघवी के साथ 122 लाइसेंस रद्द करने का निर्णय लेने के अलावा आपातकाल के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के रवैये की आलोचना करने और राष्ट्रपति की माफी के अधिकार को न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र से न टकराने की उम्मीद करने जैसे विचार एक न्यायाधीश के रूप में उनकी मौलिक और विवेकशील छवि के ही उदाहरण थे। लेकिन कई बार देखा गया है कि सार्वजनिक जीवन में न्याय और शुचिता की लड़ाई लड़ने वालों में से अनेक का व्यक्तिगत जीवन ठीक इसके विपरीत होता है।
यह स्वागतयोग्य है कि बढ़ती सामाजिक जागरूकता के कारण अब ऐसे दोहरे चरित्रों पर से नकाब उठने लगी है; प्रखर बौद्धिक तरुण तेजपाल के बाद न्यायमू्र्ति गांगुली का हश्र इसका ज्वलंत उदाहरण है। जो लोग तर्क दे रहे हैं कि पीड़ित लड़की ने पुलिस में अभी तक शिकायत नहीं की, वे भूलते हैं कि उसने सर्वोच्च न्यायालय की समिति के सामने आकर शपथपत्र दिया था। जहां तक न्यायमूर्ति गांगुली को अपना पक्ष न रखने देने का तर्क है, तो मामला सामने आने के बाद एक से एक दिग्गज उनके पक्ष में खड़े हुए थे, बाद में हालांकि उन्हीं में अधिकांश ने उन्हें इस्तीफा दे देने की सलाह दी थी।
अगर यह इतना ही एकतरफा मामला होता, तो केंद्रीय कैबिनेट उन्हें हटाने के लिए राष्ट्रपति से सिफारिश की मंजूरी लेने की हद तक नहीं जाती। आगे इस मामले में कानूनी कार्रवाई कब शुरू होगी, यह भले तय न हो, पर यह शीशे की तरह साफ है कि न्यायमूर्ति गांगुली ने वर्षों की मेहनत से अपनी जो साख बनाई थी, वह नहीं लौटने वाली।