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मिट्टी का ढेर बन कर रह गई विरासत
अमर उजाला ब्यूरो/ रोहतक
Updated Mon, 13 Oct 2014 02:39 AM IST
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जिम्मेदारों की अनदेखी की वजह से कुषाण कालीन विरासत मिट्टी के ढेर में बदल कर रह गई है।
जिस विरासत को सहेज कर रखने की जरूरत थी, लोग उसे मिट्टी समझकर खोद ले गए। ऐसा तब हुआ है जब ऑर्कियोलॉजी डिपार्टमेंट ने इसे अपने संरक्षण में लेने का दावा किया था।
इसके बाद भी न तो इसकी संभाल की गई और न ही इसके लिए कोई योजना बनाई गई।
स्टेट ऑर्कियोलॉजी डिपार्टमेंट और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से संरक्षित खोखराकोट के नजदीक कुषाण कालीन के दो स्तूप बने थे। यह स्तूप 1981 में खुदाई के दौरान सामने आए थे।
एमडीयू में इतिहास विभाग के तत्कालीन एचओडी और फिलहाल ऑर्कियोलॉजी डिपार्टमेंट के सदस्य प्रोफेसर मनमोहन और उनकी टीम ने खोखराकोट में खुदाई के दौरान इन स्तूपों को खोजा था। उन्होंने स्टेट ऑर्कियोलॉजी डिपार्टमेंट और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को इसकी रिपोर्ट दी थी। बताया जाता है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण टीम ने यहां का दौरा भी किया था। इन स्तूपों को संरक्षित करने के दावे किए गए, लेकिन इस संबंध में कुछ नहीं किया गया।
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1934 से संरक्षित है क्षेत्र
आजादी से पहले ही रोहतक के खोखराकोट क्षेत्र को विरासतों का हिस्सा मान लिया गया था। अंग्रेजों ने 1934 में इस पूरे क्षेत्र को संरक्षित क्षेत्र घोषित किया था। प्रो. मनमोहन और उनकी टीम ने 1981 में जब यहां पावर हाउस के नजदीक खुदाई की, तब यह स्तूप सामने आए। इसके बाद ऑर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के अधिकारियों ने भी यहां का दौरा किया था। इन स्तूपों को लेकर अधिकारियों ने योजना बनाने की बात कही थी, लेकिन न तो कोई योजना सामने आई और न ही प्रशासन ने विरासत के इन निशानों को संरक्षित रखने का प्रयास किया।
राजा कनिष्क के समय के हैं स्तूप
प्रो. मनमोहन ने बताया कि खुदाई के दौरान टीले सामने आए थे। बारीकी इनकी जांच की गई तो पाया गया कि ये कुषाणकालीन ईंटों से बने हैं। ये टीले अपने ऐतिहासिक होने की दास्तां बया कर रहे थे। इसके पैनल व्हाइट सफेद मथुरा पत्थर से बने हुए हैं। इसमें प्रदर्शना पथ, रेडियल वाल्व, सर्कुलर वाल्व लगा हुआ था जो कुषाण कालीन स्तूपों में अन्य जगहों पर पाया गया था। प्रो. मनमोहन के मुताबिक 78-100 एडी के बीच बने यह स्तूप राजा कनिष्क के काल के हैं।
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जिस विरासत को सहेज कर रखने की जरूरत थी, लोग उसे मिट्टी समझकर खोद ले गए। ऐसा तब हुआ है जब ऑर्कियोलॉजी डिपार्टमेंट ने इसे अपने संरक्षण में लेने का दावा किया था।
इसके बाद भी न तो इसकी संभाल की गई और न ही इसके लिए कोई योजना बनाई गई।
स्टेट ऑर्कियोलॉजी डिपार्टमेंट और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से संरक्षित खोखराकोट के नजदीक कुषाण कालीन के दो स्तूप बने थे। यह स्तूप 1981 में खुदाई के दौरान सामने आए थे।
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एमडीयू में इतिहास विभाग के तत्कालीन एचओडी और फिलहाल ऑर्कियोलॉजी डिपार्टमेंट के सदस्य प्रोफेसर मनमोहन और उनकी टीम ने खोखराकोट में खुदाई के दौरान इन स्तूपों को खोजा था। उन्होंने स्टेट ऑर्कियोलॉजी डिपार्टमेंट और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को इसकी रिपोर्ट दी थी। बताया जाता है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण टीम ने यहां का दौरा भी किया था। इन स्तूपों को संरक्षित करने के दावे किए गए, लेकिन इस संबंध में कुछ नहीं किया गया।
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1934 से संरक्षित है क्षेत्र
आजादी से पहले ही रोहतक के खोखराकोट क्षेत्र को विरासतों का हिस्सा मान लिया गया था। अंग्रेजों ने 1934 में इस पूरे क्षेत्र को संरक्षित क्षेत्र घोषित किया था। प्रो. मनमोहन और उनकी टीम ने 1981 में जब यहां पावर हाउस के नजदीक खुदाई की, तब यह स्तूप सामने आए। इसके बाद ऑर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के अधिकारियों ने भी यहां का दौरा किया था। इन स्तूपों को लेकर अधिकारियों ने योजना बनाने की बात कही थी, लेकिन न तो कोई योजना सामने आई और न ही प्रशासन ने विरासत के इन निशानों को संरक्षित रखने का प्रयास किया।
राजा कनिष्क के समय के हैं स्तूप
प्रो. मनमोहन ने बताया कि खुदाई के दौरान टीले सामने आए थे। बारीकी इनकी जांच की गई तो पाया गया कि ये कुषाणकालीन ईंटों से बने हैं। ये टीले अपने ऐतिहासिक होने की दास्तां बया कर रहे थे। इसके पैनल व्हाइट सफेद मथुरा पत्थर से बने हुए हैं। इसमें प्रदर्शना पथ, रेडियल वाल्व, सर्कुलर वाल्व लगा हुआ था जो कुषाण कालीन स्तूपों में अन्य जगहों पर पाया गया था। प्रो. मनमोहन के मुताबिक 78-100 एडी के बीच बने यह स्तूप राजा कनिष्क के काल के हैं।