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कारावास में किंगमेकर

Thu, 03 Oct 2013 08:37 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Thu, 03 Oct 2013 08:37 PM IST
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Kingmacker in jail

चारा घोटाले में मिली सजा के खिलाफ लालू प्रसाद का ऊपरी अदालत में जाना भले तय हो, लेकिन सच यह है कि इस फैसले ने करीब चार दशक तक फैले उनके राजनीतिक जीवन का लगभग अंत कर दिया है।

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आपातकाल के बाद उनतीस की उम्र में सांसद बनने के बाद से अब तक उन्होंने भारतीय राजनीति को जिस तरह प्रभावित किया है, उतने कम ही राजनेता कर पाए। बिहार जैसे घोर जातिवादी राज्य में पिछड़ों को वाणी देकर उन्होंने सामाजिक न्याय को मजबूती दी, तो राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान लालकृष्ण आडवाणी का रथ रोककर सांप्रदायिक राजनीति को करारी चुनौती भी दी। आपातकाल-विरोधी लहर से साथ निकले उनके एकाधिक साथी जब बाद में भाजपा से जुड़े, तब भी सत्ता का सुख पाने के लिए धर्मनिरपेक्षता को तिलांजलि देना उन्होंने गवारा नहीं किया।
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उस दौर में उनकी ताकत इतनी थी कि वह एच डी देवगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल को प्रधानमंत्री बना सकते थे और रामकृष्ण हेगड़े को पार्टी से निष्कासित कर सकते थे। लेकिन यह भी सही है कि आपातकाल की लहर से निकलने वाले बड़े चेहरों में वह अकेले हैं, जो भ्रष्टाचार के कारण आज इस हश्र तक पहुंचे हैं।
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डेढ़ दशक का लालू राज बिहार में भ्रष्टाचार और विकासहीनता के लिए ही कुख्यात रहा। जब राज्य को बिजली के मामले में आत्मनिर्भर होना चाहिए था, तब अपनी पार्टी का चुनाव चिह्न लालटेन रखकर उन्होंने जताया कि उनके एजेंडे में विकास के लिए उतनी जगह नहीं है। जयप्रकाश नारायण और कर्पूरी ठाकुर के दिशा-निर्देश में जो शख्स इंदिरा गांधी के निरंकुश परिवारवाद के मुखर विरोधी के रूप में उभरा था, बाद में हमने उसी को निरपेक्ष भाव से पत्नी को सत्ता सौंपते देखा, और अभी के दुर्दिनों में भी उत्तराधिकारी के रूप में जिसे अपने बेटे का ही चेहरा दिख रहा है!


लेकिन राजनीति के हाशिये पर आने के बावजूद सायास बनाई गई उनकी विदूषक छवि के प्रशंसक इतने हैं कि बॉलीवुड को भी अपनी फिल्म हिट कराने के लिए उनके नाम का सहारा लेना पड़ता है। लालू प्रसाद को मिली सजा के बाद उनकी डगमगाती पार्टी कितना संभल पाएगी, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन उनका यह हश्र राजनीति के तमाम ताकतवरों के लिए सबक तो है ही।

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