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किलो वर्ग की पनडुब्बी

Sun, 02 Mar 2014 06:52 PM IST
अमर उजाला नई दिल्ली
अमर उजाला नई दिल्ली Updated Sun, 02 Mar 2014 06:52 PM IST
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kilo-class submarine

सिंधुरत्न हादसे ने हमारे देश में एक बार फिर पनडुब्बियों की गिरती हालत की ओर ध्यान खींचा है। भारतीय नौसेना के पास अभी 13 पनडुब्बियां हैं, जिनमें से आठ किलो वर्ग की हैं। सिंधुरत्न भी इन्हीं पनडुब्बियों में से एक है। किलो वर्ग की पनडुब्बियों का निर्माण रूस करता है। इसके मूल संस्करण का नाम 877 पल्टूज था। इस वर्ग की पहली पनडुब्बी वर्ष 1980 में रूस की नौसेना में शामिल की गई थी।

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सितंबर, 2011 तक के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, किलो वर्ग की 17 पनडुब्बियां रूस की समुद्री सीमा की रक्षा कर रही हैं, जबकि सात रिजर्व में रखी गई हैं। उसने अब तक 33 पनडुब्बियां भारत, अल्जीरिया, चीन, पोलैंड ईरान और वियतनाम जैसे देशों को बेची हैं।
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डीजल से चलने वाली यह पनडुब्बी 70-74 मीटर लंबी होती है। पानी की सतह पर इसकी गति जहां 10-12 नॉट्स है, वहीं पानी के अंदर यह 17-25 नॉट्स की गति से यात्रा करती है। इसका अर्थ यह हुआ कि यह पनडुब्बी पानी के अंदर छह किलोमीटर प्रति घंटा की गति से चलती है। 45 दिनों तक समुद्र में रहने में सक्षम यह पनडुब्बी सतह से हवा में मार करने वाली आठ मिसाइलों, 18 टॉरपीडो और 14 अंडरवाटर माइन्स ले जाने में सक्षम है। इस पनडुब्बी के संचालन में 52 सैनिकों की एक टीम की जरूरत पड़ती है। अभी किलो वर्ग की पनडुब्बी की कीमत 20-25 करोड़ अमेरिकी डॉलर है।
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दिलचस्प है कि रूस लाडा वर्ग की पनडुब्बी बनाने की कोशिश भी कर रही है, जिसे किलो वर्ग की पनडुब्बी से बेहतर बताया जा रहा है। लेकिन नवंबर, 2011 में उसने घोषणा की कि लाडा वर्ग की पनडुब्बी की फिलहाल सेवा नहीं ली जाएगी, क्योंकि उसके परीक्षण में कई खामियां सामने आई हैं।

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