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एक दूरद्रष्टा की विदाई
नई दिल्ली
Updated Thu, 15 Nov 2012 10:17 PM IST
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कृष्णचंद्र पंत का जाना जितना आकस्मिक है, उनकी खामोश विदाई उससे कम दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है। सत्ता-राजनीति में उनकी पारी बहुत लंबी कभी नहीं रही, लेकिन हर बार अपनी छोटी और चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं में उन्होंने जैसा उल्लेखनीय काम किया, वह अपनी मिसाल आप है।
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बीती सदी के सत्तर के दशक में तेलंगाना की आग को शांत करने में पंत जैसे वार्ताकार की अग्रणी भूमिका थी, जिसने 'स्वशासन' का जुमला उछालकर पहली बार स्थानीय प्रतिनिधियों को प्रशासन में जिम्मेदारी भरी भूमिका सौंपने की सिफारिश की थी।
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राजीव गांधी के प्रधानमंत्री काल में रक्षा मंत्री के तौर पर उनकी भूमिका बहुत बड़ी न होने के बावजूद बहुत महत्वपूर्ण थी, क्योंकि तब अशांत श्रीलंका में लिट्टे के खिलाफ शांति सैनिक उतारकर, और बाद में मालदीव में संभावित तख्तापलट को बेअसर करने के लिए तुरंत सेना भेजकर उन्होंने शांति और स्थिरता के प्रति वचनबद्धता का ही नहीं, अपनी प्रत्युत्पन्नमति का भी परिचय दिया था।
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सशस्त्र सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए आईएनएस-विराट और मिग-29 का तोहफा और सुदूर दमन में पहले कोस्ट गार्ड एयर स्टेशन की स्थापना भी इसी प्रतिबद्धता का सूचक थी। बाद में भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने पर योजना आयोग के उपाध्यक्ष की भूमिका में भी उन्होंने लीक से हटकर चलने की अपनी मौलिक प्रवृत्ति का ही परिचय दिया।
दसवीं पंचवर्षीय योजना में पहली बार क्षेत्रीय विकास के लिए राज्यों पर ध्यान केंद्रित किया गया, तो यह उनकी पहल का ही नतीजा था। तब भारत की आर्थिक विकास दर का लक्ष्य आठ फीसदी रखा गया था, लेकिन उतनी मजबूत आर्थिक स्थिति के बावजूद वह गद्गद नहीं थे, बल्कि बेरोजगारी कम करने के तरीकों पर विमर्श कर रहे थे।
रक्षा, वित्त, भारी इंजीनियरिंग और गृह मामले ही नहीं, एटॉमिक एनर्जी और विज्ञान व प्रौद्योगिकी मंत्रालय की जिम्मेदारी उन्होंने कुशलता से संभाली, तो ऊर्जा सलाहकार बोर्ड के पहले अध्यक्ष की भूमिका में भी उन्होंने अपनी मौलिक प्रतिभा-क्षमता का सुबूत दिया। गोविंद वल्लभ पंत जैसे दिग्गज राजनेता का पुत्र होते हुए भी उनकी छाया में रहने के बजाय उन्होंने अपनी स्वतंत्र छवि बनाई, तो यही उनके व्यक्तित्व और उपलब्धियों के बारे में बहुत कुछ कह जाता है।