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मंजूनाथ को न्याय
संपादकीय
Updated Thu, 12 Mar 2015 08:27 PM IST
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पेट्रो माफिया के खिलाफ आवाज उठाने वाले युवा अधिकारी एस मंजूनाथ के हत्यारों की सजा सर्वोच्च अदालत ने बरकरार रखकर इस व्हिसलब्लोअर के साथ न्याय किया है। अदालत ने हत्या के दोषी ठहराए गए छह लोगों की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी है। आईआईएम की डिग्री हासिल करने वाले इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के इस अधिकारी की 19 नवंबर, 2005 को उस वक्त हत्या कर दी गई थी, जब वह उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी इलाके में एक पेट्रोल पंप में घटतौली और मिलावट की जांच करने गए थे।
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इस इलाके में पेट्रो माफिया का कितना खौफ है, यह इससे पता चलता है कि मंजूनाथ की मौत के करीब आठ वर्ष बाद जब उनके जीवन पर संदीप ए वर्मा ने फिल्म बनाई, तो लखीमपुर खीरी के उसी इलाके में शूटिंग करने के लिए पेट्रो माफिया के भय से उन्हें किसी और नाम से मंजूरी लेनी पड़ी! जाहिर है, व्यवस्था में आज भी ऐसे लोगों का दबदबा है, जिन्हें कानून का भय नहीं। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि मंजूनाथ की कानूनी लड़ाई को किसी सियासी दल या सामाजिक संगठन ने नहीं, बल्कि आईआईएम के उनके दो साथियों ने ही अंजाम तक पहुंचाया, जिन्हें सलाम किया जाना चाहिए।
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वास्तव में मंजूनाथ और उनसे पहले 2003 में बिहार में राष्ट्रीय राजमार्ग अथॉरिटी के युवा इंजीनियर सत्येंद्र दुबे की हत्या के बाद से ही भ्रष्टाचार और माफिया के खिलाफ आवाज उठाने वालों की सुरक्षा का मुद्दा गरमाया था। सत्येद्र दुबे का मामला तो इसलिए भी गंभीर था, क्योंकि उन्होंने स्वर्णिम चतुर्भुज योजना में भ्रष्टाचार के खिलाफ सीधे प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी थी, इसके बावजूद उनकी हत्या कर दी गई थी! गौर किया जाना चाहिए कि आईआईटी और आईआईएम से निकले इन युवाओं ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बजाय उत्तर प्रदेश और बिहार के सुदूर क्षेत्रों में सार्वजनिक उपक्रमों में नौकरी करना मंजूर किया था और हम उन्हें बचा नहीं सके।
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इसी की परिणति के रूप में व्हिसलब्लोअर प्रोटेक्शन एक्ट-2011 पारित हो सका, हालांकि इसका अस्तित्व में आना अभी बाकी है। मगर ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा और भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए सिर्फ एक कानून पर्याप्त नहीं होगा। सवाल है कि हम एक नागरिक और समाज के रूप में खुद कितना बदलने को तैयार हैं?