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न्यायिक प्रणाली की खामी
संपादकीय
Updated Thu, 29 Jan 2015 11:03 PM IST
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नोएडा के निठारी कांड के दोषी सुरेंद्र कोली का मामला लगता है, फिर वहीं आ गया है, जहां से वह शुरू हुआ था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उसकी दया याचिका पर फैसले लेने में अत्यधिक देरी को असांविधानिक करार देते हुए उसे सुनाई गई फांसी की सजा पर रोक लगाकर उसे उम्रकैद में बदल दिया है।
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दया याचिका के मामलों में देखा गया है कि सरकारें उन पर फैसले लेने में अक्सर देर करती हैं। इस मामले में ही देखें, तो उत्तर प्रदेश सरकार को कोली की दया याचिका को राष्ट्रपति के पास भेजने में 26 महीने लग गए। दरअसल हमारी अपराध न्याय प्रणाली की खामियों पर तो ढेरों बातें होती हैं, लेकिन उसे सुधारने के ठोस प्रयास जमीन पर नजर नहीं आते हैं। इसमें सबसे बड़ा अड़ंगा हमारे ढांचे में ही कहीं है, जिसे देखने की जरूरत है।
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वास्तव में अदालतों में लंबित मामलों का जितना संबंध जजों और न्यायिक कर्मचारियों की कमी से है, उससे कहीं अधिक यह प्रशासनिक इच्छाशक्ति और सरकारी कामकाज के रवैये से भी जुड़ा हुआ है। यह कम हैरत की बात नहीं है कि जिस कोली की फांसी की सजा पर अदालत ने रोक लगाई है, उसके लिए तीन बार डेथ वारंट तक जारी हो चुका है! अदालत ने उसे 14 वर्षीय बच्ची रिंपा हलधर की हत्या के मामले में फांसी की सजा सुनाई थी। स्वाभाविक रूप से रिंपा के परिजनों के लिए यह फैसला आहत करने वाला होगा, लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है, जिसका संज्ञान अदालत ने लिया है। वह बंदी के मौलिक अधिकारों से जुड़ा हुआ है। उच्च न्यायालय की पीठ ने अपने फैसले में इसे रेखांकित करते हुए कहा है कि सजा के क्रियान्वयन में देरी से बंदी के मौलिक अधिकार का हनन होता है। यह पहला मौका नहीं है, जब न्यायपालिका ने बंदी या सजायाफ्ता के मौलिक अधिकार की बात उठाई।
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पिछले वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के तीन हत्यारों की फांसी की सजा को इसी आधार पर सर्वोच्च अदालत ने उम्रकैद में बदल दिया था। इसी तरह हरियाणा के एक बहुचर्चित हत्याकांड में दोषी ठहराए गए एक दंपति की फांसी की सजा भी उम्रकैद में बदल दी गई। कोली के मामले ने एक बार फिर न्याय की मूल भावना की याद दिलाई है कि न्याय में देरी से न्याय का अर्थ ही नहीं रह जाता। इससे यह भी पता चलता है कि अभियोजन की खामियों के कारण पीड़ित पक्ष को समय पर न्याय नहीं मिल पाता।