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चालीस साल बाद आया फैसला
नई दिल्ली
Updated Tue, 09 Dec 2014 07:25 PM IST
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पूर्व रेलमंत्री ललित नारायण मिश्र की मौत से संबंधित मामले में तकरीबन चालीस वर्ष बाद फैसला आया है, जिसका अब सांकेतिक मतलब ही रह गया है। दो जनवरी, 1975 को बिहार के समस्तीपुर में एक कार्यक्रम में एक बम धमाके में मिश्र गंभीर रूप से घायल हो गए थे और अगले दिन उनकी अस्पताल में मौत हो गई थी।
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वह उस वक्त की राजनीति के अहम किरदार थे और उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का करीबी माना जाता था। राजनीति से इतर देखें, जैसा कि उस वक्त इंदिरा गांधी ने इसमें विदेशी हाथ होने तक का आरोप लगाया था, तो यह मामला देश की न्यायिक व्यवस्था की बदहाली को ही प्रदर्शित करता है। शुरुआती दौर में ही इसे सीबीआई को सौंप दिया गया था, मगर इसकी सुनवाई पूरी होने में चार दशक लग गए। दिल्ली की अदालत द्वारा इस मामले के चार जीवित बचे आरोपियों को दोषी ठहराए जाने से पहले यह मामला 24 जजों के सामने से गुजर चुका था! इस मामले में दोषियों को 15 दिसंबर को सजा सुनाई जाएगी, लेकिन इतनी लंबी अवधि बीत जाने के बाद इस सजा का क्या मतलब होगा?
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इस मामले के दो दोषी संतोषानंद और सुदेवानंद अवधूत 75 वर्ष के हो चुके हैं और बाकी दो की उम्र भी पैंसठ वर्ष से अधिक है। न्याय का एक सामान्य सिद्धांत है कि न्याय होना ही नहीं चाहिए, बल्कि न्याय होता दिखना भी चाहिए। यदि ये चारों ऊपरी अदालत में चले जाते हैं, जिसकी पूरी संभावना है, तो यह मामला कुछ वर्ष और खिंच जाएगा। इतनी देर से आने वाले फैसले से उस साजिश के बारे में भी ठीक से पता नहीं चल सकता कि आखिर उसके पीछे और कौन लोग थे। फिर यह नहीं भूलना चाहिए कि ललित नारायण मिश्र के बेटे ने दोषी ठहराए गए आनंदमार्गियों को निर्दोष बताते हुए फैसले को गलत बताया है।
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मामले की सुनवाई में होने वाली देरी पीड़ित पक्ष और अभियुक्त, दोनों के लिए पीड़ादायक होती है। मुश्किल यह है कि अदालतों में लंबित मामलों के अनुरूप हमारा न्यायिक ढांचा नहीं है। अब भी देश भर की अदालतों में चार हजार से अधिक जजों के पद रिक्त हैं। इनमें भर्तियों के साथ ही मामलों को वरीयता के आधार पर निपटाने की भी जरूरत है। बेशक यह बहुत मुश्किल है, लेकिन क्या मामलों को समयबद्ध तरीके से निपटाने के बारे में किसी पहल पर विचार नहीं होना चाहिए?