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न्यायिक नियुक्ति पर फैसला

Fri, 16 Oct 2015 08:32 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Fri, 16 Oct 2015 08:32 PM IST
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Judgement on judicial requitement

सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण के लिए कॉलेजियम सिस्टम की जगह लेने वाले राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम को असांविधानिक बताकर खारिज कर दिया है, तो यह आश्चर्यजनक नहीं है। बेशक एनजेएसी ऐक्ट संसद के दोनों सदनों से पारित हुआ, इसे बीस राज्य सरकारों की मंजूरी मिली और सुप्रीम कोर्ट के बार एसोसिएशन समेत कुछ वरिष्ठ न्यायविदों का इसे समर्थन भी हासिल हुआ, लेकिन यह भी तथ्य है कि इसमें न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कहीं न कहीं बाधित करने का भाव था। फली एस नरीमन, राम जेठमलानी और प्रशांत भूषण जैसी शख्सियतों ने इसका इसी आधार पर विरोध किया था।

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यह मानना भी भ्रामक होगा कि उच्च न्यायपालिका में नियुक्ति और स्थानांतरण की नई व्यवस्था केंद्र की एनडीए सरकार ले आई थी। कॉलेजियम सिस्टम के विकल्प की तलाश बहुत पहले से की जा रही थी। चूंकि इस व्यवस्था में न्यायाधीश ही न्यायाधीशों को चुनते हैं; विश्व के ज्यादातर देशों में न्यायिक नियुक्ति की व्यवस्था ऐसी नहीं है, इसलिए इसमें अनियमितताओं की शिकायतें आती हैं। एनजेएसी ऐक्ट को संसद से पारित कराते वक्त विरोध नहीं हुआ, तो इसकी वजह यही है कि राजनीतिक पार्टियां कॉलेजियम सिस्टम के पक्ष में नहीं हैं। पर संसद में बहस के दौरान यह आशंका जाहिर की गई थी कि कुछ प्रावधानों के कारण शीर्ष अदालत इसे खारिज कर सकती है।
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लेकिन तब सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। अब शीर्ष अदालत द्वारा एनजेएसी ऐक्ट को खारिज कर दिए जाने के बाद इसे प्रतिष्ठा का विषय न बनाना ही उचित है। न्यायिक नियुक्तियों में विसंगतियों से खुद न्यायपालिका भी इन्कार नहीं कर रही। लिहाजा कॉलेजियम सिस्टम के बने रहने या न रहने के बजाय मुद्दा यह होना चाहिए कि उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण को गड़बड़ी से मुक्त करते हुए पारदर्शी कैसे बनाया जाए। चूंकि इस देश में हजारों-लाखों मुकदमे विभिन्न अदालतों में वर्षों-दशकों से लंबित हैं, इसलिए ऐसा कुछ नहीं होना चाहिए, जिससे न्यायिक नियुक्तियों में नाहक विलंब हो।
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