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महंगी बिजली का झटका

Fri, 19 Jun 2015 08:51 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Fri, 19 Jun 2015 08:51 PM IST
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jolt of costly power

यह विद्रूप ही है कि जो उत्तर प्रदेश बिजली की कमी के कारण जाना जाता है, और जहां बिजली पहले ही तुलनात्मक रूप से महंगी है, वहां शहरी घरेलू उपभोक्ताओं के लिए बिजली अब बारह से सत्तरह फीसदी और महंगी होने वाली है! उत्तर प्रदेश में बिजली की जैसी बुरी स्थिति है; और गर्मियों के इन दिनों में जो और बदतर हो जाती है, उससे निजात पाने के लिए आमूलचूल बदलाव की जरूरत है। बिजली महंगी कर देने से समस्या का हल नहीं होने वाला।

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राष्ट्रीय स्तर पर पावर प्लांट्स का औसत उत्पादन जहां 90 प्रतिशत है, वहीं उत्तर प्रदेश की बिजली कंपनियां अपनी क्षमता का सिर्फ 60 फीसदी ही उत्पादन कर रही हैं। इतना ही नहीं, वे महंगी बिजली बेचती हैं, और उनका ऑडिट भी नहीं होता। राज्य में लाइन लॉस न सिर्फ राष्ट्रीय औसत से 14 प्रतिशत अधिक है, बल्कि उपभोक्ताओं पर हजारों करोड़ रुपये के बिल बकाया हैं, जिनकी अविलंब वसूली की दिशा में गंभीर कोशिश नहीं दिखती। इसी तरह वीआईपी क्षेत्रों में बिजली चोरी की शिकायतें आम हैं, तो किसानों और ग्रामीण उपभोक्ताओं को सब्सिडी भी दी जाती है।
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जाहिर है, इन तमाम मोर्चों पर यदि गंभीरता से काम किया जाए, तो बिजली कंपनियों की वित्तीय सेहत सुधरने में देर नहीं लगेगी। ज्यादा कुछ नहीं, तो लाइन लॉस को एक फीसदी कम करने से ही 490 करोड़ रुपये बचाए जा सकते हैं। पर उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग को बिजली महंगी करना ही सबसे आसान तरीका लगता है।
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बेशक बेहतर अर्थनीति वह है, जिसमें बढ़ी लागत का बोझ उपभोक्ताओं को ढोने के लिए कहा जाए। लेकिन जहां बिजली क्षेत्र की तस्वीर सुधारने की प्रतिबद्धता नहीं दिखती, वहां बार-बार बिजली की दर बढ़ा देने का फैसला बेहतर अर्थनीति तो नहीं ही है, बेहतर राजनीति भी नहीं है। अखिलेश सरकार बेहतर कामकाज के वायदे के साथ राज्य की सत्ता में आई थी, पर तीन साल में बिजली की दर में यह चौथी वृद्धि है! जब बिजली का उत्पादन और उपलब्धता बढ़ाने के साथ उसकी दर को लागत के अनुरूप रखने पर ज्यादा जोर है, उस दौर में उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग का यह कदम गले नहीं उतरता।

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