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झुमका गिरा रे...

Tue, 12 Jan 2016 08:53 AM IST
वेद विलास उनियाल
वेद विलास उनियाल Updated Tue, 12 Jan 2016 08:53 AM IST
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Jhumka gira re...

साठ और सत्तर के दशक में साधना भारतीय फिल्मों में एक खास जगह रखती थी। बेशक तब वहिदा रहमान, मधुबाला, वैजंयती माला को पर्दे पर सिने दर्शक देख रहे थे, मगर साधना की अपनी शख्यिसत थोड़ा हटकर थी। उसे आप भारतीय अभिनेत्रियों में किसी भी पंक्ति में शुमार कीजिए, लेकिन यह सच है कि लोग साधना को फिल्मी पर्दे पर देखते थे, देखना चाहते थे।

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सुंदर तो वह थी ही अपनी अदाओं और फैशन के खास सेंबल से वह सबको प्रभावित करती थी। अब यह न कहिए कि ब्रिटिश नायिका हेमबर्न की तरह बालों को खास स्टाइल में रखने से ही लोग उसके प्रशंसक हो गए। पर यह कहने वाले खूब मिल जाएंगे कि साधना कट बाल उसके मिजाज पर खूब फले।
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पुराने लोग बताते हैं कि किसी टाकीज में साधना की फिल्मों को देखने वाली पांच लड़कियां तो ऐसी होती ही थी, जो उनकी तरह की बालों की लटों को झुलाए से रखती थी। वो साधना ही थी कि एक फिल्म में चूडीदार पैजामा पहनकर आईं तो मुंबई दिल्ली ही नहीं देहरादून और रांची में भी लड़कियों ने उसी फैशन को अपना लिया। साधना ने चाहे ये फैशन ट्रेंड भले किसी की सलाह पर चलाए हों लेकिन लोगों को तो केवल साधना से मतलब था।
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उसके पास सुंदरता थी और एक रहस्यपूर्ण मुस्कान थी। अभिनय भी कमाल का था, वो लव इन शिमला, एक मुसाफिर एक हसीना में जिस रूप में दिखी, वो कौन थी में उस साधना को तलाशना संभव नहीं था। मेरा साया, वक्त, राजकुमार, दूल्हा दुल्हन कई फिल्में हैं जो साधना के अभिनय के अलग अलग छवि को लेकर आए।

साधना के बारे में जी भर कर गाशिप चली। वह किसी चर्चा में रहने के लिए थी। बनती रहे मुगले आजम और दिल अपना और प्रीत पराई जैसी फिल्म, साधना अपनी किसी नई चर्चा के साथ गासिप के संसार में बनी रहती थी। बेशक उनकी फिल्में भी कामयाब होती थी लेकिन साधना की फिल्मों की बातें उसके अधूरे व्यक्तित्व का कसीदा पढ़ना था।

साधना अपनी क्षमताओं पर तो जीती ही थी।उसपर किसी का दबाव भी नहीं चलता था। बहुत से लोग उस किस्से को जानते होंगे कि उसने राजकपूर के साथ दूल्हा दुल्हन फिल्म पूरी की, लेकिन फिल्म की शूटिंग के दौरान कभी भी बातचीत नहीं की। न जाने क्यों और कब का गुस्सा था। लेकिन यह वही कर सकती थी। शो मैन के लिए यह माहौल कुछ अलग ही रहा होगा। पर साधना तो साधना थी। उसने अपनी फिल्मों से खासकर कस्बाई लड़कियों को जीने के गुर सिखाए।

फैशन की कलाएं बताई। अंदाज दिखाया। दूसरो को रिझाना सिखाया। प्रियंका के अपने अभिनय और सौंदर्य प्रतियोगिताओं के प्रतिमान से आज बरेली का नाम सामने आया हो, लेकिन बरेली साधना के गीत पर याद की जा रही थी। साधना, प्रियंका की तरह बरेली की नहीं थी, मगर उससे बरेली का नाम जुड़ गया। लोगों को लगा शायद बरेली झुमका के लिए खास तौर पर जाना जाता है। आज भी लड़कियां बरेली के झुमके बनाने की चाह रखती हैं। शहरों के नाम से कई गीत बने पर बरेली के बाजार में झुमका गिरा रे, गीत में साधना के लटके झटके सिनेमा के दर्शकों को रास आ गए


मगर केवल यह साधना का परिचय नहीं। साधना को इन बातों के दायरे में ही रखना उसके अंभिनय की संजीदगी को भुला देने जैसा है। आखिर मदन मोहन की सबसे कामयाब धुनों के कई गीत पर्दे पर साधना पर ही फबे हैं। भूल जाइए झुमका गिरे रे जैसे खास मिजाज के गीत को। उसे सुनकर तो मदन मोहन का संगीत करीब से सुनने वाले भी चौंके थे कि संजीदा धुनों का मालिक इस तरह की धुन कैसे गढ़ गया। लेकिन मदन मोहन ने जब आपकी नजरों ने समझा, मेरा साया साथ होगा, नैना बरसे, नैनो में बदरा छाए, मेरा साया, लग जा गले कि फिर हंसी रात हो न हो जैसी धुनों को सजाया तो साधना ही इन गीतों पर अभिनय करती हुई नजर आई। किसी गीत को सुनने की भी उनकी अपनी अदा थी। हमने तुमको प्यार किया है जितना कौन करेगा उतना, इस गीत में उनकी स्मित सी मुस्कान के आप कई अर्थ लगा सकते हैं।

लताजी ने जितनी सुंदरता से ये गीत गाए हैं साधना का अभिनय उन गीतों पर बोलता था। इसके अलावा फिल्मों के कई पुराने गीत याद कीजिए। ये फूलों की रानी, नैना बरसे, तेरा मेरा प्यार मगर, बेदर्दी बालमा तुझको मेरा मन याद करता है। कई गीत हैं हम लताजी के साथ साथ साधना को उस झलक को भी याद करते हैं। भारतीय फिल्म जगत बेशक साधना को मीना कुमारी, नर्गिस, वहिदा, वैजयंती का स्तर न दें, लेकिन इसी मुंबई में जो लव इन शिमला, वक्त , एक मुसाफिर एक हसीना, मेरा साया, वो कौन थी, हम दोनों जैसी फिल्में आई वो अपना एक क्लास बनाती हैं। इन फिल्मों की अपनी सुंदरता है, इसमें कहानी है, उसके अनुरूप सुंदर भाव और अभिनय है।

साधना फिल्मों के लिए अपना रुझान रखती थी। राजकपूर की पिक्चर के एक गीत मुड़-मुड़ के ना देख में उसे नृत्य टीम में शामिल किया गया था। उसका उत्साह आसमान छू रहा था। जिस रोज श्री 420 फिल्म का पहला शो था, साधना अपनी सहेलियों के साथ फिल्म देखने गई थी। फिल्म क्या देखने गई थी वह तो सहेलियों को बता रही थी कि चौथे नंबर पर जो लड़की नृत्य कर रही है वो मैं हूं। मगर फिल्म के बाद उसकी आंखों में आंसू थे। सहेलियों से कही बातें झूठी साबित हुई थी। मुड़ मुड़ के ना देख गीत तो फिल्म में था, मगर बेबी साधना उसमें न नजर न आई। क्या पता उसी का मलाल साधना को आगे भी रहा हो। या पता नहीं क्या शिकायतें थीं। पर साधना अपने रिश्तेदार राजकपूर से दूर ही रही। ले देकर एक फिल्म बनी दूल्हा दुल्हन। वो भी बस किसी तरह बन गई।

साधना जब फिल्मों में आई वह साठ का दशक था। एक दशक पहले जो अभिनेत्रियां फिल्मों के शुरुआत में आई उनका अब तक अपनी शोहरत बन चुकी थी। वे कुछ बेहद कामयाब फिल्मों को देकर अपनी शोहरत बना चुकी थी। ऐसे में नंदा, शर्मिला टैगोर या साधना, आशा पारेख के लिए अपनी जगह तलाश करनी थी।किसी करेक्टर के अनुरूप ढलना था। नई अभिनेत्रियों ने वहिदा, वैजयंती, नर्गिस, मीना कुमारी से कुछ न कुछ ग्रहण किया। अपने अभिनय को उनकी कसौटी पर कसा। लेकिन साधना ने किसी लीक को नहीं पकड़ा। उसने जो किया अपनी ही तरह से किया। पर्दे पर जो गढ़ा अपनी तरह से गढ़ा।


साधना का एक अलग फ्रेम था। उसमें साधना ही दिख सकती थी। वह उसी तरह नजर भी आईं। एक खास तरह का शोख, चुलबुलापन, संजीदगी से भरा अभिनय। लोगों ने उनकी फिल्में देखी और उन्हें पसंद किया। वह पर्दे पर अपना प्रभाव बनाए रखती थी। सुनील दत्त, शम्मी कपूर, राजकुमार, जाय मुखर्जी के साथ साधना की फिल्में कामयाब रहीं। साधना के पास दो दशक थे। उसने कुशलता के साथ उसका उपयोग किया। आगे हेमा, रेखा, मुमताज को आना था। लेकिन उससे पहले साधना अपने होने को साबित कर चुकी थी। सिने जगत के लोग अब यही कहेंगे। कई मुसाफिर थे एक हसीना थी।

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