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जनता परिवार की दुविधा

Tue, 12 May 2015 08:08 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 12 May 2015 08:08 PM IST
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Janta parivar in dilemma

जनता परिवार के विभिन्न घटकों के बीच विलय की घोषणा के महीने भर बाद भी यह कवायद सिरे नहीं चढ़ सकी है। उल्टे सपा महासचिव रामगोपाल यादव के बयान से भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है, जिनके मुताबिक बिहार विधानसभा के चुनाव में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव को अपनी पुरानी पार्टी और चुनाव चिह्न के साथ ही मैदान में उतरना चाहिए!

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बेशक विलय की प्रक्रिया में समय लग सकता है, क्योंकि कुछ तकनीकी अड़चनें भी दूर करनी होंगी। लेकिन इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि सैद्धांतिक और वैचारिक नहीं, बल्कि राजनीतिक कारणों से इस कवायद में जुटे दल नफा-नुकसान देख रहे हैं। इस समूह में जो छह पार्टियां शामिल हैं, उनमें से सपा जहां उत्तर प्रदेश में, जद(यू) और राजद बिहार में, जद (एस) कर्नाटक और इंडियन नेशनल लोकदल हरियाणा तक सिमटी हुई हैं। भले ही मुलायम सिंह यादव को प्रस्तावित नई पार्टी का प्रमुख घोषित किया गया है, पर सपा के भीतर से ही विलय के विरोध में स्वर उठे हैं। वहीं विलय को लेकर सर्वाधिक आशान्वित नीतीश कुमार की राजनीतिक मजबूरी किसी से छिपी नहीं है। जीतन राम मांझी ने पिछड़ों, मुसलमानों और महादलितों को मिलाकर तैयार की गई उनकी सोशल इंजीनियरिंग में सेंध लगा दी है। यदि राजद के निलंबित सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव मांझी के साथ चले जाते हैं, तो इसका खामियाजा भी नीतीश और लालू को ही उठाना होगा।
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इस राजनीतिक गणित के बावजूद यह समझने की जरूरत है कि मतदाता काफी समझदार हो गए हैं और वे जातिगत समीकरणों में नहीं उलझने वाले। इसी तरह सिर्फ धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे पर भाजपा को चुनौती नहीं दी जा सकती। बदलती राजनीति की सबसे ताजा झलक दिल्ली में दिखाई दी थी, जहां मतदाताओं ने लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक बहुमत हासिल करने वाली भाजपा को खारिज कर भ्रष्टाचार और सुशासन की बात करने वाली आम आदमी पार्टी पर भरोसा किया। वास्तव में इन पार्टियों को वाम दलों से सीख लेनी चाहिए, जिनमें कम से कम इतनी वैचारिक ईमानदारी तो है कि वे विलय के बजाय कार्यक्रमों के आधार पर तालमेल बनाए हुए हैं। जाहिर है, जनता परिवार के इन घटकों को ठोस कार्यक्रम और नीतियों के साथ आगे आना चाहिए; सिर्फ एक झंडे के नीचे आकर जनता का भरोसा नहीं जीता जा सकता।

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