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जनता दरबार
अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Thu, 04 Dec 2014 08:37 PM IST
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जनता परिवार के पुराने सदस्य फिर से एकजुट होने की जो कवायद कर रहे हैं, वह राजनीतिक रूप से खुद को प्रासंगिक बनाए रखने की कोशिश ही अधिक लगती है। समाजवादियों का इस तरह का गठजोड़ पहले भी कई बार हुआ और नेताओं की महत्वाकांक्षाओं के कारण टूटा है। समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव की अगुआई में एक मंच के नीचे आ रहे इन छह दलों की ओर से कोई विस्तृत कार्यक्रम तो पेश नहीं किया गया है, लेकिन इसके पीछे एकजुट होकर भाजपा को संसद के अंदर और बाहर चुनौती देने की रणनीति दिख रही है।
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हालांकि इन दलों के पास लोकसभा में कुल 15 सीटें ही हैं, मगर राज्यसभा में ये कांग्रेस और वामदलों के साथ मिलकर एनडीए सरकार के लिए परेशानी खड़ी कर सकते हैं, जहां अभी एनडीए के पास बहुमत नहीं है। मगर यह भी देखने की जरूरत है कि देश की राजनीति पच्चीस वर्षों में काफी बदल चुकी है, जब वी पी सिंह की अगुआई में जनता दल का गठन किया गया था। अब राजनीति के मुहावरे बदल चुके हैं। एक पूरी युवा पीढ़ी तैयार है, जिसे न तो मंडल से मतलब है, न कमंडल से। उसके सपने और उसकी उम्मीदें अलग हैं। फिर ये धड़े पिछड़े वर्ग की जो राजनीति कर रहे थे, उसे कुछ हद तक नरेंद्र मोदी की अगुआई में भाजपा ने भी हथिया लिया है।
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जो दल एकजुट हो रहे हैं, उनके नेताओं पर गौर करें, तो मुलायम सिंह यादव 75 वर्ष के हैं, देवगौड़ा 81 वर्ष के हैं, तो लालू प्रसाद और ओम प्रकाश चौटाला अदालती कार्रवाइयों के चलते अभी चुनाव तक नहीं लड़ सकते। शरद यादव अभी 70 वर्ष के नहीं हुए हैं, पर उनका अपना कोई जनाधार नहीं है। ले-देकर एक नीतीश कुमार ही हैं, जिनकी उम्र 63 वर्ष है और जिन पर कोई दाग नहीं है। यही नहीं, इसके अलावा इन नेताओं का प्रभाव भी उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में सिमटा हुआ है। देवगौड़ा की पहुंच भी कर्नाटक में अब वोकलिग्गा समुदाय के एक छोटे हिस्से तक सिमट गई है। इसके अलावा एक बड़ी अड़चन एक दूसरे को नेता के रूप में स्वीकार करने की भी है।
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ऐसे में लाख टके का सवाल है कि जनता परिवार के ये बिखरे धड़े आज एकजुट होकर क्या वाकई कोई मजबूत विकल्प पेश कर सकेंगे। यदि जातिवादी और क्षेत्रीय राजनीति के इर्द-गिर्द ही यह पूरी कवायद होने जा रही है, तो इसका जवाब न में होगा।