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फिर वही गलती

Thu, 14 Mar 2013 09:52 PM IST
Updated Thu, 14 Mar 2013 09:52 PM IST
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italian marines issue

हत्या के अरोपी दो इतालवी नौसैनिकों को सजा देने के लिए भारत लाने के संबंध में हमारी सरकार के सख्त रवैये को समझा जा सकता है, जो अब अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में जाने से लेकर यूरोपीय संघ से समर्थन मांगने जैसे तमाम विकल्प टटोल रही है। स्तब्ध करने वाली बात यह है कि दोनों इतालवी नागरिकों की भारत वापसी के बारे में आश्वस्त करते हुए इटली के राजदूत ने सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा दायर किया था।

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उन्हें अपनी छवि की परवाह हो, न हो, इस देश को अपनी शीर्ष न्यायपालिका की गरिमा की फिक्र है। उसके विश्वास को ठेस पहुंचाने वाले बख्शे नहीं जाने चाहिए। लेकिन यही बात हमारी सरकार के बारे में नहीं कही जा सकती। अगर यह सच है कि विदेश में रह रहे इतालवी नागरिकों के वोट देने के मामले में इटली ने हमें गुमराह किया, तो यह हमारी सरकार की समझदारी पर बड़ा प्रश्नचिह्न है।
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इस तरह का भोलापन तब तो और अक्षम्य है, जब अतीत में भी बार-बार संदिग्ध विदेशी नागरिक और संबंधित मुल्क हमें बेवकूफ बनाते रहे हैं। कोई कैसे भूल सकता है कि डेनमार्क का एक नागरिक किम डेवी पुरुलिया में संदिग्ध रूप से हथियार गिराकर भाग गया था, और हमारी सरकार न तो उसे पकड़ पाई और न ही डेनमार्क पर दबाव बना पाई, उसे सजा देने की तो बात ही छोड़ दें।
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भोपाल में गैस रिसने से जो भीषण तबाही हुई, उसका नतीजा लोग आज भी भुगत रहे हैं, लेकिन उस मामले में मुख्य आरोपी वॉरेन एंडरसन को जान-बूझकर भागने दिया गया! इसी तरह की नरमी बोफोर्स मामले में ओत्तावियो क्वात्रोचि के साथ बरती गई, हालांकि कांग्रेस यह कहकर अपना बचाव कर रही है कि उस और इस मामले में कोई समानता नहीं है।

करीब डेढ़ दशक पहले केरल में ही जासूसी के आरोप में पकड़े गए दो फ्रेंच नागरिकों को पेरिस ने धोखे से जिस तरह बुलाया, फिर सजा काटने भारत नहीं भेजा, वह तो आंख खोल देने वाला था। उस मामले की जांच कर रही सीबीआई ने इंटरपोल की मदद ली थी, इसके बावजूद कुछ नहीं हुआ।


जाहिर है, जब तक राष्ट्र के तौर पर हम मजबूती नहीं दिखाएंगे, तब तक सीबीआई और सर्वोच्च न्यायालय के विश्वास का हनन होता रहेगा। इतालवी नौसैनिकों को भारत में उनके जुर्म की सजा दिलाकर ही हम इस सिलसिले को खत्म कर सकेंगे।

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