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कहीं यह माइक टेस्टिंग तो नहीं
सहीराम
Updated Mon, 05 Oct 2015 07:56 PM IST
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सूत और कपास के बिना जुलाहों में लट्ठम-लट्ठा ऐसे ही होता है, जैसे सुब्रमण्यम स्वामी और उनके विरोधियों में हो रहा था। यह खबर क्या आई साहब कि स्वामी जी जेएनयू के वाइस-चांसलर होने जा रहे हैं, बस लट्ठम-लट्ठा शुरू हो गया। स्वामी जी ने कहा कि मैं अपनी शर्तों पर जेएनयू का वाइस-चांसलर बनूंगा। जब केंद्र में उनके मंत्री बनने की खबर आई थी, तब भी तो उन्होंने यही नहीं कह दिया था कि मैं अपनी शर्तों पर मंत्री बनूंगा? क्योंकि फिर उनके मंत्री बनने की खबर कभी आई ही नहीं।
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मगर अब जब वाइस चांसलर बनने की खबर आई, तब उन्होंने जरूर कह दिया कि मैं अपनी शर्तों पर वाइस चासंलर बनूंगा। वहां के छात्र और शिक्षक नक्सलवादी हैं, मैं उन्हें निकाल बाहर करूंगा। बिना छात्रों और शिक्षकों के यूनिवर्सिटियां चलने लगेंगी, तो सचमुच मजा आ जाएगा। स्वामी जी ने कहा कि वहां आंदोलन हुआ, तो यूनिवर्सिटी बंद कर दूंगा। शुक्र है कि अभी तक पुणे का फिल्म ऐंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट चल रहा है। वर्ना बंद होने की नौबत तो उसकी थी। जब भी किसी व्यक्ति को किसी संस्था का मुखिया बनाया जाता है, तो उसे वह और आगे ले जाने का वायदा करता है। पर इन दिनों यह नया ट्रेंड है कि कभी सरकार, तो कभी संस्था का मुखिया ही संस्था को बंद करने की धमकियां देने लगता है।
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पुणे फिल्म ऐंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट में गजेंद्र चौहान की नियुक्ति का वहां के छात्रों ने विरोध किया, तो सरकार ने कहा कि हम इंस्टीट्यूट ही बंद कर देंगे। अब स्वामी जी कह रहे हैं कि जेएनयू का वाइस चांसलर बना, तो यूनिवर्सिटी बंद कर दूंगा। पर फिर मानव संसाधन विकास मंत्रालय से खबर आई कि उनके नाम पर तो कभी विचार ही नहीं हुआ। यह बाबा रामदेव को पद्मश्री देने जैसा मामला हो गया। पहले खबर आई कि बाबा को पद्मश्री मिल रही है। पर बाबा ने कोई इंटरेस्ट ही नहीं दिखाया। बाद में पता चला कि उनके नाम पर तो कभी विचार ही नहीं हुआ था। फिर खबरें क्यों चलने लगती हैं? कहीं यह माइक टेस्टिंग जैसा मामला तो नहीं है?
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