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जिंदगी के हक में
Updated Tue, 05 Mar 2013 09:22 PM IST
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कानून और परिस्थितियां कई बार कैसे विद्रूप प्रस्तुत करती हैं, यह विवादास्पद सशस्त्र बल विशेषाधिकार (अफ्स्पा) कानून के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से अनशन कर रहीं ईरोम चानू शर्मिला के मामले में देखा जा सकता है, जिन्हें गुनहगार बना दिया गया है।
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दिल्ली की एक अदालत ने अक्तूबर, 2006 में जंतर-मंतर पर अनशन की वजह से शर्मिला पर आत्महत्या के प्रयास के आरोप तय किए हैं। बहुत संभव है कि भारतीय दंड विधान की धारा 309 को जब स्वीकार किया गया होगा, तब शायद यह अंदेशा न रहा हो कि कभी इसका इस्तेमाल शांतिपूर्ण जिंदगी के लिए लोकतांत्रिक अधिकार की मांग करने वाले किसी संघर्ष में भी करना पड़ सकता है।
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और यही तो शर्मिला ने भी अदालत से कहा कि उनका संघर्ष मौत के लिए नहीं, जिंदगी के लिए है। विडंबना देखिए कि जज की सहानुभूति भी उनके साथ है, मगर उन्हें कहना पड़ा कि अफ्स्पा पर निर्णय करना एक राजनीतिक प्रक्रिया है, मगर कानून की नजर में उनका अनशन आत्महत्या के प्रयास के दायरे में आता है। यही वजह है कि अफ्स्पा को हटाने की मांग कर रहीं शर्मिला को बार-बार गिरफ्तार कर लिया जाता है।
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दरअसल धारा 309 के तहत सिर्फ एक वर्ष की कैद का ही प्रावधान है! पांच नवंबर, 2000 को इंफाल के नजदीक एक गांव में असम राइफल्स के जवानों की गोलीबारी में दस नागरिक मारे गए थे। इस घटना ने इरोम को इतना उद्वेलित किया कि वह अफ्स्पा के खिलाफ ही उठ खड़ी हुईं। आयरन लेडी के नाम से मशहूर हो चुकीं शर्मिला ने तबसे अन्न त्याग दिया है, उन्हें जबर्दस्ती नली के सहारे भोजन दिया जाता है।
लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए अपनी सरकारों के खिलाफ गांधीवादी तरीके से संघर्ष के और भी उदाहरण हैं। इस क्रम में म्यांमार की आंग सान सू की का नाम लिया जा सकता है, जिन्होंने सैन्य सरकार को झुकने के लिए विवश कर दिया। मगर शर्मिला का संघर्ष अब दुनिया की सबसे लंबी भूख हड़ताल के रूप में भी दर्ज हो चुका है।
फ्रेगरेंश ऑफ पीस (शांति की महक) जैसी कविता लिखने वाली शर्मिला का जीवन उनके अपने लिए ही नहीं, बल्कि मणिपुरवासियों और लोकतंत्र का सम्मान करने वाले तमाम लोगों के लिए कीमती है। उनके संघर्ष ने हमारे समय की विसंगतियों को ही उजागर किया है।