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मुस्लिमों का हित

Thu, 12 Dec 2013 07:34 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Thu, 12 Dec 2013 07:34 PM IST
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Intrest of Muslim

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के अखिलेश सरकार के मुस्लिम युवाओं के खिलाफ दर्ज आतंकी मामले वापस लेने के फैसले पर रोक लगाने से निश्चय ही अगले कुछ महीने में होने वाले लोकसभा चुनावों की तैयारी कर रही समाजवादी पार्टी को झटका लगा होगा।

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सपा ने पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान घोषणा पत्र में वायदा किया था कि वह उन मुस्लिमों के खिलाफ दर्ज आतंकी मामलों को वापस लेगी, जिन्हें पिछली मायावती सरकार के दौरान कथित तौर पर फंसाया गया था। इससे पहले भी इलाहाबाद हाई कोर्ट और निचली अदालतों ने अखिलेश सरकार की मंशा पर सवाल उठाए थे और अब उसने दो टूक कहा है कि ऐसे मामलों में उसे केंद्र सरकार की सहमति से ही कोई कदम उठाना चाहिए, क्योंकि मामले केंद्रीय कानूनों के तहत दर्ज किए गए थे।
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इसमें दो मत नहीं कि राजनीतिक कारणों से आतंकी मामलों में समुदाय विशेष के लोगों के खिलाफ पहले भी मामले दर्ज हुए हैं। आखिर हैदराबाद के मक्का-मस्जिद और मालेगांव में हुए धमाकों में ऐसी चूक देखी गई थी, जिसका खामियाजा निर्दोष लोगों को भुगतना पड़ा था। मगर आतंकी मामलों में राजनीति से हटकर सोचने की जरूरत है। आखिर किसी भी निर्दोष के खिलाफ ऐसे मामले क्यों दर्ज होने चाहिए, जिनमें जमानत तक का प्रावधान नहीं होता?
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दूसरी ओर यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि जिन लोगों के खिलाफ बम धमाकों से लेकर गैर कानूनी तरीके से हथियार रखने के संगीन आरोप दर्ज हैं, क्या उन्हें बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के सिर्फ इसलिए छोड़ देना चाहिए, क्योंकि ऐसा करना किसी खास राजनीतिक दल के लिए मुफीद होगा। वास्तव में ऐसे मामलों में अभियोजन की बड़ी भूमिका होती है, पर यह जिम्मा पुलिस या सीबीआई जैसी संस्थाओं के पास होता है, जिन पर अक्सर राजनीतिक दबाव में काम करने के आरोप लगते हैं।


विडंबना ही है कि मुजफ्फरनगर दंगों के बाद भी राज्य सरकार ने सिर्फ एक समुदाय के पीड़ितों के लिए राहत की घोषणा की थी, जिसे सर्वोच्च अदालत ने खारिज कर दिया। दूसरी ओर राहत शिविरों की बदहाली और बच्चों की मौतों की खबर राज्य सरकार की मंशा पर ही सवाल उठा रही है। आम चुनावों से पहले उठाए जा रहे ऐसे कदम राजनीतिक रूप से भी आत्मघाती साबित हो सकते हैं।

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