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इराक में फंसे भारतीय
नई दिल्ली
Updated Wed, 18 Jun 2014 07:55 PM IST
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मोसुल में चालीस भारतीयों का अपहरण स्तब्ध करने वाला एक ऐसा घटनाक्रम है, जो सरकार से अविलंब सक्रिय होने की मांग करता है। इराक में व्याप्त गृहयुद्ध पिछले कुछ दिनों से जिस भयावह स्थिति में पहुंचा है, उसने विश्व समुदाय को पहले से ही बेहद चिंतित कर रखा है। लेकिन शायद ही किसी ने सोचा हो कि आतंकवादी विदेशी नागरिकों को अगवा कर सकते हैं।
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यह बिल्कुल हो सकता है कि भारतीय नागरिकों को अगवा कर आतंकवादियों ने उन विदेशी ताकतों को संदेश देने की कोशिश की हो, जो इराक सरकार की नाकामी के मद्देनजर वहां सैन्य हस्तक्षेप की संभावनाएं तलाश रही हैं। या आईएसआईएल ने इराक सरकार के प्रति नई दिल्ली सरकार की सदाशयता से खीझकर यह कदम उठाया है? चाहे जिस भी वजह से हो, आतंकियों का यह कदम इसलिए गलत और अमानवीय है, क्योंकि भारत न सिर्फ इराक का पुराना दोस्त है, बल्कि वहां दखल देने का उसका दूर-दूर तक कोई इरादा नहीं है। और न ही इराक में काम कर रहे भारतीय इस युद्ध में वहां के किसी धड़े के लिए चुनौती या खतरा हैं।
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हमारी सरकार के एजेंडे में तो फिलहाल इन अपहृत लोगों समेत उन तमाम भारतीयों की सकुशल वापसी ही सबसे ऊपर होना चाहिए, जो कामकाज के सिलसिले में वहां लंबे समय से हैं। टिकरित के एक अस्पताल में चालीस से ज्यादा भारतीय नर्सों के फंसे होने की कहानी भी कम दर्दनाक नहीं है, जो कर्ज लेकर वहां गई हैं, और अब बगैर वेतन के वहां से लौटना नहीं चाहतीं! इस समय भी इराक में सोलह से अट्ठारह हजार भारतीयों के फंसे होने की आशंका है, जिनकी सुरक्षा के लिए तमाम कदम उठाए जाने चाहिए।
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पिछले दो दिन से केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने इराक में रह रहे भारतीयों की हिफाजत के लिए कई कदम उठाए तो हैं, पर इराक की मौजूदा जटिल स्थिति भी बहुत उम्मीद करने का अवसर नहीं दे रही! एक तो इराक की अल मालिकी सरकार का हुक्म बगदाद से बाहर नहीं चलता, तिस पर अगवा करने वाले आतंकी संगठन का ही जब ठीक-ठीक पता नहीं चला है, उसने अगवा करने के पीछे का अपना इरादा ही नहीं जताया है, तो इस दिशा में वार्ता भी भला किससे और कैसे की जाए? जाहिर है, यह घटनाक्रम केंद्र की नई-नवेली मोदी सरकार के लिए एक विकट चुनौती की तरह है।