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सिर्फ रस्म नहीं है आजादी
नई दिल्ली
Updated Wed, 14 Aug 2013 08:12 PM IST
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एक लोकतंत्र के लिए 66 बरस का अरसा ज्यादा नहीं होता, लेकिन जब हम अपने आसपास देखते हैं, तो हमें खुद पर गर्व होता है। खासतौर पर पाकिस्तान को देखा जा सकता है कि वह बर्बादी के किस रास्ते पर है। सीमा पर उसकी हरकतों का जिस एकजुटता से हमारी संसद ने करारा जवाब दिया है, यह हमारे लोकतंत्र की ताकत ही है।
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फिर भी, 15 अगस्त का महत्व सिर्फ रस्मी तौर पर नहीं है, इसने हमारी नियति बदली है। इसने हमें जीने, सपने देखने और उसे पूरा करने का जज्बा दिया। हालांकि आजादी की लौ अब तक अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंच सकी है। संसद की मंजूरी को छटपटा रहा खाद्य सुरक्षा बिल इसका सुबूत है। एक ओर तो हमने सभी बच्चों को स्कूल भेजने के लिए कानून बना लिया, पर बिहार में जहरीले मध्याह्न भोजन से हुई 23 बच्चों की मौत की घटना ने हमारे तंत्र की नाकामियों को उजागर किया।
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आजादी एक राजनीतिक बयान भर नहीं है, और न ही इसकी सार्थकता पांच बरस में एक सरकार चुनने तक सीमित है। लेकिन सच यह भी है कि हमारे राजनीतिक वर्ग ने आजादी को कमतर कर दिया है! इतना कि एक युवा आईएएस को माफिया से लड़ने की कीमत चुकानी पड़ती है, तो एक शीर्ष राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखने के कारण एक व्यक्ति के लिए सारे कायदे ताक पर रख दिए जाते हैं।
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उत्तराखंड के हादसे ने दिखाया कि प्रकृति ही नहीं, अपने लोगों के साथ भी हम कैसा बर्ताव कर रहे हैं। यह स्थिति अच्छी नहीं है कि जो काम विधायिका या कार्यपालिका को करना चाहिए, उसके लिए न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़े। विडंबना यही है कि चौतरफा राजनीति हावी होती जा रही है, फिर वह तेलंगाना का मसला हो या फिर जम्मू-कश्मीर में हुई ताजा हिंसा। यह नाजुक दौर है, हमारी राजनीति और अर्थव्यवस्था, दोनों के लिए।
राजनीति के लिए इसलिए, क्योंकि लोगों का भरोसा उससे उठ रहा है; और अर्थव्यवस्था की हालत यह है कि विकास दर पांच फीसदी से आगे बढ़ती नहीं दिख रही। दरअसल यह मौका आत्मनिरीक्षण कर अपनी ताकत को पहचानने का है। स्वतंत्रता दिवस से ऐन पहले आईएनएस सिंधुरक्षक पनडुब्बी के हादसे ने भले ही नौसेना में मायूसी ला दी, लेकिन तीनों सेनाओं की ताकत की वजह से ही हम गर्व से सिर उठा सकते हैं।
यह हमारे लोकतंत्र की ताकत ही है कि नियमगिरि के आदिवासी आज अपनी नियति का फैसला खुद कर रहे हैं। दरअसल जब यह कहा जाता है कि भारत का समय आ गया है, तब चुनौती कहीं अधिक बड़ी लगती है। रॉबर्ट फॉर्स्ट की पंक्तियों को थोड़ा बदलकर कहें तो, अभी हमें ढेरों वायदे पूरे करने हैं और सोने से पूर्व मीलों चलना है।