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काबुल में बढ़ती हिंसा
अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Sun, 17 May 2015 08:13 PM IST
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अफगानिस्तान में नाटो सैनिकों की प्रतीकात्मक उपस्थिति से आतंकवादी जिस तरह बेखौफ होते जा रहे हैं, वह खुद काबुल के साथ-साथ उन लोगों के लिए भी चिंतित करने वाला होना चाहिए, जो वहां के घटनाक्रम पर पैनी नजर गड़ाए हुए हैं। अब काबुल हवाई अड्डे के पास यूरोपीय संघ के काफिले पर हमला बोलकर तालिबान के फिदायीन दस्ते ने अपने बढ़ते दुस्साहस का ही संदेश दिया है।
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पिछले ही सप्ताह तालिबान ने एक गेस्ट हाउस पर धावा बोलकर चौदह लोगों को मौत के घाट उतार दिया था, जिनमें चार भारतीय भी थे। बताया यह भी जाता है कि गेस्ट हाउस हमले में आतंकवादियों के निशाने पर वस्तुतः भारत के राजदूत थे। वैसे तो अफगानिस्तान में नाटो सैनिकों की दमदार मौजूदगी के बीच भी विदेशी राजनयिक और उनके दफ्तर आतंकवादियों के निशाने पर रहे हैं। पिछले साल हेरात स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास में हुआ आतंकवादी हमला अब भी स्मृतियों में ताजा है। लेकिन अब काबुल में विदेशी सैनिकों की नाममात्र की उपस्थिति के कारण आतंकवादी हमलों की आशंका स्वाभाविक ही बढ़ गई है, क्योंकि तालिबान तेजी से अपने पांव जमाने की कोशिश में लग गए हैं।
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ऐसे समय वहां एक मजबूत सरकार की जरूरत थी। जबकि नए राष्ट्रपति अशरफ गनी ने अब तक ऐसा कोई संदेश नहीं दिया है, जिससे लगे कि वह हिंसा और अस्थिरता पर लगाम लगाना चाहते हैं। उनके पास करजई जैसा अनुभव तो नहीं ही है, उल्टे उनकी सरकार इन दिनों जिस तरह की आंतरिक मुश्किलों से जूझ रही है, उसमें अलगाववादी ताकतों का सिर उठाना स्वाभाविक है। सत्ता संभालने के बाद पाकिस्तान से उनकी नजदीकी बढ़ने का यह संदेश भी गया है कि वह आतंकवाद को निर्मूल करने के प्रति कटिबद्ध नहीं हैं। अफगान सरकार का यह रवैया तब और खतरनाक है, जब आईएस वहां अपनी पैठ बना चुका है।
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काबुल का अस्थिर होना भारत के लिए चिंताजनक है, जिसका न सिर्फ वहां भारी निवेश है, बल्कि जो अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता का भी आकांक्षी है। पिछले दिनों भारत आए अशरफ गनी ने हालांकि आतंकवाद को खत्म करने की प्रतिबद्धता जताई थी। लेकिन हालिया घटनाएं संकेत हैं कि आने वाले दिन अफगानिस्तान के लिए बेहद उथल-पुथल भरे हो सकते हैं।