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अच्छे दिनों की ऐसी शुरुआत

Fri, 20 Jun 2014 08:48 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Fri, 20 Jun 2014 08:48 PM IST
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Increase in Rail ticket price

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से कड़े फैसले के लिए तैयार रहने के लिए कहा था, लगता है कि इसकी शुरुआत हो गई है। खाद्य पदार्थों की महंगाई के 9.5 फीसदी की दर से बढ़ने के साथ ही अब रेल मंत्रालय ने यात्री किराये और माल भाड़े में बढ़ोतरी कर आम लोगों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।

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हैरत यह है कि रेल मंत्रालय ने यात्री किराये और माल भाड़े में बढ़ोतरी के लिए अगले महीने पेश होने वाले बजट का भी इंतजार नहीं किया। निश्चय ही, रेलवे भारी वित्तीय बोझ के तले दबा हुआ है, मगर इसका यह मतलब नहीं है कि पहले ही महंगाई तले दबे लोगों पर और बोझ डाल दिया जाए। वैसे भी इराक संकट के कारण तेल के दाम और बढ़ने की आशंका बनी हुई है, तिस पर माल भाड़ा बढ़ने से जरूरी चीजों के दाम और बढ़ जाएंगे।
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विचित्र बात यह है कि अच्छे दिन लाने के वायदे के साथ सत्ता में आई एनडीए सरकार के रेल मंत्री डी वी सदानंद गौड़ा इस फैसले के लिए पूर्ववर्ती यूपीए सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं! उनका कहना है कि उन्होंने तो बस 16 मई के उस आदेश की तामील ही की है, जिसमें पिछली सरकार के रेल मंत्री मल्लिकार्जुन खड़गे ने यात्री किराये में कुल 14.2 फीसदी और माल भाड़े में 6.5 फीसदी का प्रस्ताव रखा था। यही नहीं, बढ़ती महंगाई के मामले में भी एनडीए सरकार ने यूपीए सरकार जैसे जमाखोरी वाले तर्क दिए हैं।
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सवाल है कि जब नई सरकार को अपना पहला रेल बजट पेश करना ही है, तो ऐसी क्या हड़बड़ी हो गई कि उसने पिछली सरकार के फैसले को हरी झंडी दिखा दी? प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी सरकार का रोडमैप पेश करते हुए हाई स्पीड रेल कॉरिडोर और बुलेट ट्रेन चलाने जैसे वायदे किए थे, मगर इससे पहले जरूरी है कि आम लोगों को परिवहन का सस्ता साधन सुलभ हो। यह विडंबना ही है कि लंबे अरसे तक क्षेत्रीय राजनीति का शिकार रहे रेलवे ने पहले तो तकरीबन एक दशक तक कोई किराया ही नहीं बढ़ाया और अब हालत ऐसी हो गई कि एक साथ इतना बोझ डाला जा रहा है। निश्चय ही रेलवे को संकट से उबारने के लिए नए संसाधन जुटाने होंगे, मगर इसके लिए कहीं अधिक व्यावहारिक तरीके तलाशे जा सकते हैं।

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