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व्यापमं के जाल में
संपादकीय
Updated Wed, 25 Feb 2015 08:44 PM IST
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मध्य प्रदेश के बहुचर्चित व्यावसायिक परीक्षा मंडल यानी व्यापमं घोटाले में राज्यपाल रामनरेश यादव का इस्तीफा इस अर्थ में स्तब्ध करने वाला है कि पद पर रहते हुए किसी राज्यपाल के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में प्राथमिकी दर्ज होने, और उसकी प्रतिक्रिया में त्यागपत्र देने का यह पहला उदाहरण बताया जा रहा है।
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हालांकि हकीकत तो यह है कि शीर्ष पदों पर भ्रष्टाचरण के मामले अब उतने चौंकाते भी नहीं हैं। राज्यपाल के पद पर राजनीतिक नियुक्तियां तो बहुत पहले से होती ही आ रही हैं, पर अब खुद महामहिमों में भी अपने पद की मर्यादा बनाए रखने की वैसी प्रतिबद्धता नहीं रह गई है; एक आपत्तिजनक सीडी के सार्वजनिक होने पर आंध्र प्रदेश के राज्यपाल पद से नारायण दत्त तिवारी के इस्तीफा देने को अभी इतना भी समय नहीं हुआ है कि वह घटना हमारी स्मृति से ओझल हो जाए।
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मध्य प्रदेश की राजनीति में आलोड़न पैदा करने वाला व्यापमं घोटाला सिर्फ इसलिए चर्चित नहीं है कि इसमें पैसे लेकर अनेक अयोग्य लोगों को नौकरी दी गई, बल्कि यह इसलिए भी चौंकाने वाला है कि इसमें राजनेताओं, वरिष्ठ अधिकारियों और कारोबारियों की मिलीभगत रही है।
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इस घोटाले में राज्यपाल के बेटे और ओएसडी की संलिप्तता तो पहले ही साबित हो चुकी है। वनरक्षक पद की परीक्षा देने वाले कुछ युवाओं की नौकरी की सिफारिश खुद राज्यपाल ने उच्चाधिकारियों से की थी; इस प्रक्रिया में उनके लेटरहेड का इस्तेमाल किया गया था, जो उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने में एक अहम सुबूत बना।
सैकड़ों करोड़ रुपये के इस घोटाले में राज्यपाल का इस्तीफा बेशक एक बड़ा घटनाक्रम है, पर विपक्ष इस घोटाले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान समेत और अनेक लोगों की लिप्तता के जो आरोप लगा रहा है, उसकी भी जांच होनी चाहिए।
दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा सुरक्षा प्राप्त एक ह्विस्लब्लोअर का दावा भी विपक्ष के आरोप से मिलता-जुलता है कि रिजल्ट की असली एक्सेल शीट और हार्ड डिस्क से छेड़छाड़ की गई है। राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेत्री उमा भारती ने इस घोटाले की सीबीआई जांच की मांग की है।
सच्चाई यह है कि सीबीआई जांच की मांग को ठुकराकर राज्य की शिवराज सिंह चौहान सरकार अपने प्रति उपजते संदेहों को और बढ़ाने का ही काम करेगी।