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किसानों के हित में
नई दिल्ली
Updated Sun, 30 Aug 2015 07:52 PM IST
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जमीन अधिग्रहण अध्यादेश वापस लेने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चौंकाने वाली घोषणा को आशंकित किसानों को भरोसा दिलाने के कदम के रूप में देखना चाहिए। मन की बात कार्यक्रम में अध्यादेश वापस लेने के साथ प्रधानमंत्री ने भूमि अधिग्रहण के पुराने कानून में उन बिंदुओं को लागू करने की भी बात कही है, जो किसानों को अधिक लाभ दिलाएंगे।
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लोकसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी ने भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन को जिस तरह बड़ा मुद्दा बनाया था, और सत्ता में आने के बाद संसद से पारित न करा पाने के बावजूद यह सरकार जिस तरह बार-बार भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लेकर आ रही थी, उस परिप्रेक्ष्य में इस निर्णय को 'पीछे हटने' के तौर पर देखा जा सकता है। आखिर यह सरकार लगातार कह ही रही थी कि देश को विकास के रास्ते पर तेजी से आगे ले जाना है, तो यूपीए सरकार द्वारा लाए गए भूमि अधिग्रहण कानून से आगे जाना होगा।
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ऐसे में, कोई चाहे, तो केंद्र सरकार के इस फैसले को आगामी बिहार विधानसभा चुनाव और गुजरात में हुई हिंसा की पृष्ठभूमि में रखकर व्याख्या करने के लिए भी स्वतंत्र है। इससे तो खैर इन्कार ही नहीं है कि चौतरफा आर्थिक हताशाओं के बीच भूमि अधिग्रहण पर सरकार का यह रुख व्यापार-उद्योग क्षेत्र, तथा विदेशी निवेशकों के लिए झटके से कम नहीं होगा। चीन की मौजूदा आर्थिक बदहाली के बाद जो रेटिंग एजेंसियां भारत पर दांव लगाए हुए थीं, सरकार के इस फैसले के बाद वे यहां से भी हताश हो सकती हैं।
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पर व्यापकता में देखें, तो यह जोखिम उठाकर अपनी सरकार की दीर्घावधि की छवि के लिए प्रधानमंत्री ने ठीक किया है। जो किसान इस देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, अगर उन्हीं को सरकार की नीयत पर संदेह हो, तो इससे दुखद और कुछ नहीं हो सकता। यह फैसला किसानों में सरकार का भरोसा वापस दिलाने के साथ विपक्षी हमले को भी भोथरा करने में सफल होगा।
इससे यह भ्रम भी दूर होना चाहिए कि भूमि अधिग्रहण संशोधन को प्रधानमंत्री ने अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया था। रही बात अर्थव्यवस्था की, तो भारत इतनी विशाल अर्थव्यवस्था वाला देश है, और इसके फंडामेंटल्स इतने मजबूत हैं कि सिर्फ इस एक फैसले से कोई बहुत बड़ा नुकसान नहीं होने वाला।