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बच्चियों के हक में

Thu, 11 Jul 2013 08:54 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Thu, 11 Jul 2013 08:54 PM IST
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in the interest of girls

हरियाणा के जींद में कुल बीस गांवों में सक्रिय एक खाप पंचायत ने कन्या भ्रूण की जांच और हत्या पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा कर एक मिसाल पेश की है। हाल के वर्षों में खाप पंचायतों की पहचान चूंकि फतवों और फरमानों के कारण ही ज्यादा रही है, ऐसे में, इनमें से कोई अगर सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ पहल करती है, तो आश्चर्य के साथ-साथ सुखद उम्मीद भी पैदा होती है।

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हालांकि फैसले के उल्लंघन पर जुर्माना और लगातार उल्लंघन पर सामाजिक बहिष्कार का जो फरमान इस पंचायत ने जारी किया है, उससे सहमत नहीं हुआ जा सकता, क्योंकि आधुनिक समाज में दंडित करने का अधिकार कानून और अदालत को ही है। प्रेम विवाह पर हत्या कर देने, प्रेमी जोड़े को भाई-बहन की तरह रहने का हुक्म देने या गांव से बाहर निकाल देने की सजा देने के खाप पंचायतों के फरमानों की कठोर आलोचना इसीलिए की जाती रही है।
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इसके बावजूद जींद में लिया गया फैसला खासकर उस समाज के लिए दूरगामी महत्व का है, जहां बच्चियों का अनुपात लगातार कम होता जा रहा है। लिंगानुपात घटने का कुफल यह हुआ है कि लड़कियों के अभाव में सुदूर पश्चिम बंगाल और झारखंड से दुल्हनें लानी पड़ रही हैं। इसके ब्योरे हैं कि दूसरे क्षेत्र और समुदाय से दुल्हनें लाने का हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में कैसा प्रतिकूल सामाजिक असर पड़ रहा है।
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इस प्रक्रिया में कई बार स्थानीय लोगों को ठगी का शिकार भी होना पड़ता है। पिछले कुछ समय से सामाजिक सुधार के स्वर खाप पंचायतों के भीतर से उठते सुने गए हैं, तो उसकी वजह ये व्यावहारिक दिक्कतें भी हो सकती हैं। पिछले साल उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में ऐसी ही एक खाप पंचायत ने कन्या भ्रूणहत्या के खिलाफ अभियान शुरू किया था, तो लगभग उस समय जींद में ही खाप महापंचायत की कई बैठकें हुई थीं, जिनमें कन्या भ्रूणहत्या और ऑनर किलिंग को अपराध माना गया था।


यह तो नहीं कह सकते कि जींद में हुई इस पहल से उत्तर भारत की हिंदी पट्टी में रातोंरात कोई बड़ा बदलाव आ जाएगा, लेकिन यह उम्मीद तो की ही जा सकती है कि इससे उन इलाकों में भी देर-सबेर लोगों की मानसिकता बदलेगी, जो बच्चियों को आज भी परिवार और समाज के लिए बोझ समझते हैं।

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