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बेहतर बदलाव की उम्मीद में
नई दिल्ली
Updated Sun, 06 Apr 2014 07:35 PM IST
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अफगानिस्तान के राष्ट्रपति चुनाव में ज्यादातर शांतिपूर्ण और रिकॉर्ड 58 प्रतिशत मतदान उन सबके लिए उत्साहित करने वाला घटनाक्रम है, जो इस अशांत मुल्क के भविष्य के प्रति चिंतित हैं। कड़ाके की ठंड, बारिश और तालिबान की धमकियों के बावजूद मतदाताओं की कतार इतनी लंबी थी कि कई जगह मतपत्र कम पड़ गए। महिलाओं ने भी भारी संख्या में मतदान कर बेहतर बदलाव के प्रति अपना उत्साह दिखाया।
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यह चुनाव सिर्फ सत्ता के लोकतांत्रिक हस्तांतरण के कारण ही अनूठा नहीं है, बल्कि आगे की चुनौतियों को देखते हुए भी बहुत महत्वपूर्ण है। अमेरिकी नेतृत्व में नाटो सैनिक इसी साल अफगानिस्तान से कूच कर जाएंगे। ऐसे में, कबाइली लड़ाइयों और आतंकवाद से क्षत-विक्षत इस देश की आंतरिक सुरक्षा का सवाल फिर से गहरा गया है।
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हामिद करजई ने अगर अमेरिका के सुरक्षा प्रस्ताव पर सहमति जता दी होती, तो दस हजार विदेशी सुरक्षा बल आगे भी अफगानिस्तान की सुरक्षा में लगे रहते। पर एक दशक से अधिक समय तक अमेरिकी समर्थन से सरकार चलाने वाले करजई को अब अचानक महाशक्ति देश की नीयत में खोट दिखने लगा है। उदारवादी माने जाने वाले करजई के लिए अब खुद की कट्टर छवि निर्मित करना मजबूरी है, क्योंकि विदेशी सैनिकों की विदाई के बाद अफगानिस्तान में तालिबान और दूसरे कट्टरवादियों के बन आने की आशंका जताई जा रही है।
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दरअसल अफगानी जनता तो बेहतर बदलाव चाहती है, पर वहां का भूगोल और समाज इतना जटिल है कि सिर्फ रिकॉर्ड वोटिंग से चीजें बदल जाएंगी, ऐसा यकीन के साथ नहीं कहा जा सकता। नए राष्ट्रपति पर प्रांतों के गवर्नर चुनने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होगी, और उनका यह फैसला मुल्क में शांति और स्थिरता की गारंटी होगा।
फिलहाल चुनावी दौड़ में आगे चल रहे प्रत्याशियों में से कुछ ने अमेरिका के साथ सुरक्षा समझौता करने का संकेत दिया है, पर जहां की राजनीति नस्लीय समूहों और क्षेत्रीय आधारों पर तय होती है, वहां अभी के आश्वासनों पर कोई कितना भरोसा करे! भारत समेत पूरा लोकतांत्रिक विश्व अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता का आकांक्षी है। लेकिन इसके लिए जरूरी होगा कि वहां तालिबान जैसे तत्वों की वापसी की कोई आशंका न रह जाए।