बुनकरों के हित में
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हथकरघा बनारस की प्राचीनतम शिल्पकारी है, यह करीब छह सौ साल पहले पैदा हुए कबीर के पेशे से भी पता चलता था। उस बनारस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बुनकरों के लिए एक ट्रेड फैसिलिटी सेंटर की आधारशिला रखने का सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं, व्यावहारिक महत्व भी है। मशीन से तैयार कपड़ों ने पूरी दुनिया में हथकरघा उद्योग को हाशिये पर डाल दिया है, पर अपने यहां सरकारी उदासीनता के कारण स्थिति इतनी दयनीय है कि जाने-माने नाट्यकर्मी प्रसन्ना को बुनकरों की बदहाल स्थिति सुधारने की मांग के साथ इसी महीने हुबली में भूख हड़ताल पर बैठना पड़ा है।
जो पूर्वी उत्तर प्रदेश कभी हथकरघा उद्योग के लिए जाना जाता था, वहां के लाखों बुनकर दशकों से बेहाल जिंदगी जी रहे हैं। हाल के वर्षों में बड़ी आबादी ने हथकरघा छोड़ छोटी-मोटी नौकरियों को तरजीह दी है, तो इसकी वजह यही है। इसी उत्तर प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनाव में हथकरघा उद्योग का मुद्दा उठाते राहुल गांधी को मोहम्मद फैजान ने एक रैली में दोटूक कहा था कि बुनकरों की बेहतरी की योजनाओं से बिचौलियों को बाहर कीजिए। नतीजतन यूपीए सरकार ने बुनकरों की कर्ज माफी का एक पैकेज दिया था, पर उसका व्यापक लाभ इसलिए नहीं मिला, क्योंकि छोटे बुनकर बैंकों के बजाय महाजन से कर्ज लेते हैं।
ऐसा लगता है कि केंद्र की एनडीए सरकार ने बुनकरों के मामले में पिछली सरकार की गलती से सीख ली है। इसीलिए हथकरघा को प्रोत्साहित करने और बुनकरों को विकास की मुख्यधारा में लाने के लिए इसने बनारस के अलावा बरेली, लखनऊ, सूरत, कच्छ, भागलपुर और मैसूर में व्यावसायिक केंद्रों के गठन की बजट में मंजूरी दी।
बुनकरों को नया जीवन देना है, तो उन्हें सस्ता कर्ज उपलब्ध कराने और बिचौलियों से मुक्ति दिलाने के अलावा अपना उत्पाद सीधे बाजार में बेचने का अवसर उपलब्ध कराना होगा। ई-कॉमर्स और फ्लिपकार्ट जैसे जुमले सुनने में अच्छे लगते हैं, पर सबसे पहले बुनकरों को लेवल प्लेइंग फील्ड चाहिए। उनकी स्थिति तभी सुधरेगी, जब सरकार तमाम योजनाओं पर अमल करने की प्रतिबद्धता दिखाएगी।