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राजनीतिक आकाओं की सेवा में

Mon, 07 Oct 2013 07:02 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Mon, 07 Oct 2013 07:02 PM IST
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In favour of political boss

सरकार ने चुनाव आयोग के इस सुझाव को मानने से इन्कार कर दिया है कि सरकारी अधिकारियों को सेवानिवृत्त होते ही राजनीति में प्रवेश करने से रोका जाए। चुनाव आयोग चाहता था कि सेवानिवृत्ति और राजनीतिक पारी शुरू करने के बीच थोड़ा अंतराल रहे। यह प्रस्ताव प्रथम श्रेणी के अधिकारियों के लिए था।

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सरकार का इन्कार अटॉर्नी जनरल के सुझाव के बाद आया है। अटॉर्नी जनरल ने कहा था कि ऐसा करना संविधान के प्रावधानों के खिलाफ होगा। ऐसा नहीं है कि सारे अधिकारी राजनीति में जाना चाहते हैं, लेकिन ऐसा चाहने वाले अधिकारी कम भी नहीं हैं। यह जगजाहिर है कि ऐसे अधिकारी किस तरह अपने राजनीतिक आकाओं की सेवा करते हैं। उनके कई निर्णय जनहित में न होकर किसी पार्टी विशेष या किसी व्यक्ति विशेष के हित में होते हैं।
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हाल ही में केंद्रीय मंत्री कमलनाथ ने मध्य प्रदेश में एक चुनावी रैली में अधिकारियों को सरेआम धमकाते हुए कहा कि कांग्रेस की सरकार बनी, तो उन अधिकारियों की खबर ली जाएगी, जो प्रदेश की भाजपा सरकार के लिए काम कर रहे हैं। उनका धमकी देना गलत था। हो सकता है कि यह धमकी अपनी पार्टी के प्रति अधिकारियों की उपेक्षा से निकली हो, लेकिन इससे चुनाव आयोग की आशंका सही भी साबित होती है।
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जब सरकारें बदलती हैं, तो नई सरकार क्यों थोक में अधिकारियों का तबादला करती है, क्या यह किसी से छिपा हुआ है? हर सरकार के मुखिया और कर्ताधर्ताओं के अपने चहेते अधिकारी होते हैं। कोई अधिकारी कैसे अपने राजनीतिक आकाओं का चहेता बनता है, यह बात उनके द्वारा लिए गए निर्णयों को पढ़कर समझी जा सकती है। चुनाव आयोग का सुझाव एक वाजिब चिंता की वजह से आया था। इसके नतीजे भी यकीनन अच्छे ही होते। शायद इसीलिए गृह, विधि और कार्मिक मंत्रालय इससे सहमत थे।


सरकार अधिकारियों को सेवानिवृत्त होने के बाद एक निश्चित अवधि के लिए किसी निजी कंपनी में काम करने से रोकती है। ऐसा सरकार के हितों की रक्षा के लिए किया गया है। इसी तरह अगर अधिकारियों को सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद राजनीति में जाने से रोक लिया जाता, तो उनके निर्णयों में तत्काल लाभ की इच्छा नहीं जुड़ी होती। लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह कदम भी उठाया जाता, तो अच्छा होता।

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