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भारत के हक में
नई दिल्ली
Updated Tue, 29 Jul 2014 12:43 PM IST
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वैश्विक व्यापार के पैरोकार विकसित देश मुक्त व्यापार की जो व्यवस्था कायम करना चाहते हैं, उसमें शुरू से ही असंतुलन रहा है। विकासशील देशों की उत्पादन की परिस्थितियां, श्रम और जरूरतें, विकसित देशों की तुलना में बिल्कुल भिन्न हैं। ऐसे में इन देशों के साथ विकसित देशों जैसा व्यवहार नहीं किया जा सकता।
बात आज की नहीं है, दो दशक पहले विश्व व्यापार संगठन के गठन और दोहा दौर की वार्ता के समय से ही विकसित देश विकासशील देशों पर निरंतर कृषि सब्सिडी कम करने का दबाव बनाते आए हैं। यदि भारत की ही बात की जाए, तो खेती पर न केवल देश की पचास फीसदी से अधिक आबादी निर्भर है; बल्कि देश की एक तिहाई से भी अधिक आबादी को दो वक्त का अनाज सस्ते में इसलिए मिल पाता है, क्योंकि उस पर सरकार सब्सिडी देती है।
जाहिर है, कृषि सब्सिडी के बिना न तो भारतीय किसानों का भला हो पाएगा और न ही खाद्यान्न सुरक्षा कार्यक्रम चल पाएगा। मगर सवाल यह भी है कि क्या भारत व्यापार सुगमता समझौते (टीएफए) को लेकर अपने कड़े रुख के चलते वैश्विक व्यवस्था में अलग-थलग तो नहीं पड़ जाएगा?
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वर्तमान व्यवस्था के मुताबिक खाद्य सब्सिडी खाद्यान्न उत्पादन के दस प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। मगर मुश्किल यह है कि इसका आकलन 1986-88 की कीमतों के आधार पर किया गया है, जिसे व्यावहारिक नहीं कहा जा सकता। चाहे कितनी भी आलोचनाएं की जाएं, खाद्यान्न सुरक्षा भारत की एक सचाई है, जिससे कोई इनकार नहीं कर सकता। बेशक, यह सवाल उठाया जा सकता है कि जब देश में खाद्यान्न की इतनी जरूरत है, तब केंद्र और राज्य की सरकारें उसके रख-रखाव का ठीक से इंतजाम क्यों नहीं करतीं?
यदि भारत विश्व व्यापार संगठन में खाद्य सुरक्षा के लिए सार्वजनिक भंडारण की अपनी जरूरत का मुद्दा उठा रहा है, तो उसे इस ओर भी ध्यान देना होगा कि गरीबों तक पहुंचने के बजाय हर वर्ष हजारों टन अनाज सड़ क्यों जाता है? असल में भारत की लड़ाई घरेलू जरूरतों और वैश्विक व्यापार के दोतरफा मोर्चे पर है।
यदि भारत और उसका समर्थन कर रहे क्यूबा, वेनेजुएला और बोलिविया जैसे देश टीएफए को लेकर संशकित हैं, तो इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि विकसित और विकासशील देशों को एक ही शर्तों के तहत नहीं रखा जा सकता। व्यापार सरलीकरण समझौता तब तक व्यावहारिक और न्यायसंगत नहीं हो सकता, जब तक कि एक संतुलित वैश्विक व्यापारिक ढांचा न खड़ा किया जाए।
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बात आज की नहीं है, दो दशक पहले विश्व व्यापार संगठन के गठन और दोहा दौर की वार्ता के समय से ही विकसित देश विकासशील देशों पर निरंतर कृषि सब्सिडी कम करने का दबाव बनाते आए हैं। यदि भारत की ही बात की जाए, तो खेती पर न केवल देश की पचास फीसदी से अधिक आबादी निर्भर है; बल्कि देश की एक तिहाई से भी अधिक आबादी को दो वक्त का अनाज सस्ते में इसलिए मिल पाता है, क्योंकि उस पर सरकार सब्सिडी देती है।
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जाहिर है, कृषि सब्सिडी के बिना न तो भारतीय किसानों का भला हो पाएगा और न ही खाद्यान्न सुरक्षा कार्यक्रम चल पाएगा। मगर सवाल यह भी है कि क्या भारत व्यापार सुगमता समझौते (टीएफए) को लेकर अपने कड़े रुख के चलते वैश्विक व्यवस्था में अलग-थलग तो नहीं पड़ जाएगा?
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वर्तमान व्यवस्था के मुताबिक खाद्य सब्सिडी खाद्यान्न उत्पादन के दस प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। मगर मुश्किल यह है कि इसका आकलन 1986-88 की कीमतों के आधार पर किया गया है, जिसे व्यावहारिक नहीं कहा जा सकता। चाहे कितनी भी आलोचनाएं की जाएं, खाद्यान्न सुरक्षा भारत की एक सचाई है, जिससे कोई इनकार नहीं कर सकता। बेशक, यह सवाल उठाया जा सकता है कि जब देश में खाद्यान्न की इतनी जरूरत है, तब केंद्र और राज्य की सरकारें उसके रख-रखाव का ठीक से इंतजाम क्यों नहीं करतीं?
यदि भारत विश्व व्यापार संगठन में खाद्य सुरक्षा के लिए सार्वजनिक भंडारण की अपनी जरूरत का मुद्दा उठा रहा है, तो उसे इस ओर भी ध्यान देना होगा कि गरीबों तक पहुंचने के बजाय हर वर्ष हजारों टन अनाज सड़ क्यों जाता है? असल में भारत की लड़ाई घरेलू जरूरतों और वैश्विक व्यापार के दोतरफा मोर्चे पर है।
यदि भारत और उसका समर्थन कर रहे क्यूबा, वेनेजुएला और बोलिविया जैसे देश टीएफए को लेकर संशकित हैं, तो इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि विकसित और विकासशील देशों को एक ही शर्तों के तहत नहीं रखा जा सकता। व्यापार सरलीकरण समझौता तब तक व्यावहारिक और न्यायसंगत नहीं हो सकता, जब तक कि एक संतुलित वैश्विक व्यापारिक ढांचा न खड़ा किया जाए।