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राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में

Sun, 29 Sep 2013 07:49 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Sun, 29 Sep 2013 07:49 PM IST
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In centre of national politics

नरेंद्र मोदी की दिल्ली में हुई रैली भाजपा के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित होने के बाद उनकी सफलतम रैलियों में से रही, तो इसका कुछ श्रेय उनकी वक्तृत्व कला को जाता है, कुछ भाजपा की तैयारी को और कुछ कांग्रेस की हालिया गड़बड़ियों को।

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राष्ट्रीय राजनीति के केंद्रस्थल में, केंद्रीय नेताओं की सुनियोजित अनुपस्थिति का नरेंद्र मोदी ने पूरा सदुपयोग किया। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पर निशाना साधकर उन्होंने भाषण की शुरुआत की, 'परिवार' पर तीखे व्यंग्य किए, और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी लपेटे में लिया। रैली में जमा भारी भीड़ उनका उत्साहवर्द्धन कर रही थी, तो उसकी वजह साफ है। भ्रष्टाचार, महंगाई और आर्थिक नाउम्मीदी के बीच मोदी केंद्र सरकार की नीतियों की जैसी आलोचना करते हैं, वह लोगों को अच्छा लगता है। उनके द्वारा पेश किए जाने वाले आंकड़े अतिरंजित हो सकते हैं, तमाम कवायदों के बावजूद अल्पसंख्यकों के बीच उनकी स्वीकार्यता पर भी संदेह है, लेकिन पिछले करीब एक दशक से खामोश प्रधानमंत्री को देख-देखकर ऊब चुके लोगों में उनकी ललकार उम्मीद जगाती है।
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गुजरात में विकास की जो छवि उन्होंने गढ़ी है, उससे भी लोगों में यह भरोसा पैदा होता हो, तो आश्चर्य नहीं कि वह केंद्र की सत्ता में आएंगे, तो लोगों को रोजगार मिलेगा, गरीबी दूर होगी और भ्रष्टाचार खत्म होगा। अलबत्ता आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की चुप्पी देखने लायक है। वैश्विक स्तर पर उनकी अनुकूल छवि बनाने के लिए रैली में विदेशी राजनयिकों को भी आमंत्रित किया गया था, लेकिन पाकिस्तानी दूतावास की अनदेखी कर और अपने भाषण में अमेरिकी राष्ट्रपति तथा पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को निशाना बनाकर उन्होंने प्रकारांतर से यही साबित किया कि देश का नेतृत्व करने वाले राष्ट्रीय नेता की परिपक्व मानसिकता अभी उनमें नहीं आई है।
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फिर दिल्ली भाजपा की जो दुर्दशा है, उसमें जल्दी ही होने वाले विधानसभा चुनाव में मोदी के लिए जुटी भीड़ उनकी पार्टी की जीत में तब्दील हो पाएगी या नहीं, यह देखना अभी शेष है। इन सबके बावजूद मोदी की रैलियों से यह तो साफ हो रहा है कि देश का जनमत परिवर्तन चाहता है।

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