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विश्व विजेता से ऐसी बेरुखी

Wed, 28 Aug 2013 07:58 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Wed, 28 Aug 2013 07:58 PM IST
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Ignorance of gold winner hocky team

देश की युवा तीरंदाज दीपिका कुमारी और उनकी साथी तीरंदाजों ने पोलैंड में जो उपलब्धि हासिल की है, उसने इस खेल में भारत के लिए नई संभावनाओं को जन्म दिया है। खासतौर से दीपिका की उपलब्धि इसलिए अहम है, क्योंकि लगातार दो स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने अगले महीने होने वाले रिकर्व तीरंदाजी विश्व कप के फाइनल्स मुकाबले के लिए अपनी जगह बनाई है।

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इसके बाद भी दीपिका, बोम्बायला देवी और रिमिल बुरेली का स्वदेश लौटने पर जैसा फीका स्वागत किया गया, उसने इस पारंपरिक खेल के प्रति खेल प्रतिष्ठानों की बेरुखी को ही उजागर किया है। यह हैरानी की बात है कि तड़के जब ये तीनों खिलाड़ी विमानतल पर पहुंचीं, तो भारतीय तीरंदाजी संघ का एक भी नुमाइंदा वहां मौजूद नहीं था! क्या क्रिकेट टीम के साथ ऐसे व्यवहार की कल्पना की जा सकती है?
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खेलों के प्रति इस दोहरे रुख का नतीजा है कि जब हमारी लड़कियां जूनियर हॉकी या फुटबॉल स्पर्धा जीतकर लौटती हैं, तो उन्हें वैसा सम्मान नहीं मिलता, जिसकी वे हकदार होती हैं। यही नहीं, उन्हें तैयारियों के लिए जरूरी बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मिलतीं। तीरंदाजी की इस टीम को ही देख लीजिए, जिसके साथ कोई फिजियो तक नहीं था। इस सबके बावजूद दीपिका जिस बेहद मामूली पृष्ठभूमि से निकलकर इस मुकाम तक पहुंची हैं, वह किसी परिकथा से कम नहीं है।
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मगर यह भी समझने की जरूरत है कि उन्हें मीडिया ने सितारा नहीं बनाया है, यह उनकी मेहनत का नतीजा है। वह विश्व की नंबर एक खिलाड़ी तक रह चुकी हैं और फिर से शिखर हासिल करने की उनकी संभावनाएं खत्म नहीं हुई हैं। मगर हर समय बाइट के लिए बेताब रहने वाले मीडियाकर्मियों ने इन खिलाड़ियों के साथ जैसा व्यवहार किया, उसने व्यक्तिगत निजता के सवाल को भी रेखांकित किया है कि किस तरह मीडिया के कारण उसका हनन हो रहा है।


सिर्फ एक इंटरव्यू नहीं देने के कारण दीपिका के बारे में यह कहना कि वह सफलताओं के कारण अहंकारी हो गई हैं, गैरजिम्मेदाराना होने के साथ आपत्तिजनक भी है। यदि संविधान ने मीडिया को अभिव्यक्ति की आजादी दी है, तो उसमें निजता के अधिकार भी सन्निहित हैं, जिसकी हकदार दीपिका और उनकी साथी खिलाड़ी भी हैं, जिसका सम्मान किया जाना चाहिए।

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