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कैसे भरोसा करें

Fri, 30 Aug 2013 08:08 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Fri, 30 Aug 2013 08:08 PM IST
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How trust on Pm

अमूमन कम बोलने वाले प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने रुपये की बदहाली और अर्थव्यवस्था की गिरती साख से उपजी परिस्थितियों पर संसद में अपनी सरकार का पक्ष जरूर रखा, लेकिन वह आश्वस्त नहीं कर पाए कि हालात वाकई जल्दी सुधर जाएंगे।

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उनके भाषण के कुछ घंटे बाद ही जारी किए गए चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के आंकड़ों में विकास दर साढ़े चार फीसदी से भी नीचे रह गई, जिससे आसन्न संकट का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। यह ठीक है कि वैश्विक परिस्थितियों के कारण एशिया की दूसरी मुद्राओं की हालत भी डॉलर के मुकाबले कमजोर हुई है। मगर इस स्थिति के लिए घरेलू स्तर की नाकामियां और बीते कुछ वर्षों में सामने आए भ्रष्टाचार और घोटाले भी कम जिम्मेदार नहीं हैं।
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दरअसल यूपीए सरकार अपने अंतर्विरोधों में इतनी उलझ गई है कि मौजूदा हालात के लिए वित्त मंत्री पी चिदंबरम राष्ट्रपति बन चुके अपने पूर्ववर्ती प्रणब मुखर्जी के समय के कुछ फैसलों को इसके लिए जिम्मेदार बता रहे हैं! वहीं, प्रधानमंत्री का तर्क है कि विपक्ष संसद चलने नहीं देता, इसलिए निवेशक यहां से हाथ खींच रहे हैं। यदि वाकई ऐसा होता, तो फिर सवाल है कि खाद्य सुरक्षा और भूमि अधिग्रहण (संशोधन) विधेयक लोकसभा में पारित कैसे होता?
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प्रधानमंत्री का यह कहना ठीक है कि निर्यात बढ़ाकर और पेट्रोलियम खर्च में कटौती कर चालू खाते के घाटे को कम किया जा सकता है। लेकिन ये दोनों ही कदम इस बात पर निर्भर करते हैं कि उनकी सरकार इसके लिए क्या कर रही है। खनन क्षेत्र की जो स्थिति है, उसमें भला निर्यात कैसे बढ़ाया जा सकता है, बल्कि हालत तो यह है कि कोयला आयात करना पड़ रहा है। क्या इस स्थिति के लिए कोयला घोटाले को जिम्मेदार नहीं माना जाना चाहिए?


जहां तक पेट्रोलियम खर्च का मामला है, तो यह तो फिलहाल सरकार के बस में ही नहीं है, क्योंकि सीरिया के संकट के चलते कच्चे तेल के दाम अभी और बढ़ सकते हैं। तब शायद सरकार के पास एक ही रास्ता बचेगा कि वह डीजल को भी पूरी तरह से नियंत्रण मुक्त कर दे, पर क्या वह ऐसा कर सकेगी? प्रधानमंत्री ने इस मर्ज के लिए सोने के प्रति भारतीयों के प्रेम को भी जिम्मेदार बताया है, लेकिन पारंपरिक रूप से इस पर अंकुश लगाना संभव नहीं है, वह भी तब, जब त्योहारों का मौसम नजदीक है। ऐसे में क्या अर्थव्यवस्था सिर्फ मानसून के भरोसे रहेगी? प्रधानमंत्री तो यही कह रहे हैं!

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