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भीतर की चुनौती से कैसे निपटें

Tue, 22 Apr 2014 08:08 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Tue, 22 Apr 2014 08:08 PM IST
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How to deal with the challenge within

नरेंद्र मोदी भले ही विकास, सुशासन और गुजरात मॉडल की बार-बार दुहाई दे रहे हैं, लेकिन भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार के कुछ नेता ही विवादास्पद बयानों के जरिये उनके लिए मुसीबतें खड़ी कर रहे हैं। भाजपा और संघ ने भले ही गिरिराज सिंह और प्रवीण तोगड़िया के बयानों से पल्ला झाड़ लिया है, लेकिन क्या इतना ही काफी है?

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अभी इन दोनों के बयानों पर विवाद थमा नहीं कि शिवसेना के एक विधायक रामदास कदम का भी एक भड़काऊ बयान सामने आया है। सवाल है कि लोकसभा चुनाव के अभियान के ऐन बीच में ऐसी नौबत क्यों आ गई कि भाजपा और सहयोगी दलों के नेताओं की ओर से इस तरह के बयान आ रहे हैं। असल में पिछले वर्ष सितंबर में भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद से मोदी को संघ परिवार के भीतर से ही दो तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
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पहली चुनौती स्वाभाविक रूप से उनकी उम्मीदवारी और उनके नेतृत्व को लेकर रही है, जिसे लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेता आज तक पचा नहीं पाए हैं। इसी का नतीजा है कि इन दोनों नेताओं की ओर से कई बार ऐसे बयान आते हैं, जिनमें उनकी असंतुष्टि का भाव साफ तौर पर उजागर हो जाता है। इसका एक उदाहरण जोशी का वह बयान है, जिसमें उन्होंने कहा था कि 'मोदी नहीं भाजपा की लहर है'। यह मोदी को कमतर बताने का उनका अपना तरीका है। हालांकि इस तरह की चुनौती से पार्टी के भीतर मोदी के वर्चस्व को कोई खास खतरा नहीं है।
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उनके लिए दूसरी चुनौती कहीं अधिक बड़ी है; और वह यह है कि दस वर्ष से सत्ता से बाहर भाजपा और संघ परिवार में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो मोदी की अगुवाई में हिंदुत्व के एजेंडे को आगे करना चाहते हैं। इससे मोदी की विकास पुरुष की उस छवि को धक्का लगता है, जो उन्होंने पूरे चुनाव अभियान के दौरान प्रस्तुत की है। चुनाव आयोग ने गिरिराज सिंह के चुनाव प्रचार पर पाबंदी लगा दी है, मगर यह भाजपा को देखना है कि उसके लिए पार्टी या संघ का कोई और नेता नई मुसीबत पैदा न करे। भाजपा के रणनीतिकार भी जानते ही हैं कि अभी 311 सीटों पर चुनाव बाकी हैं, जो कि पार्टी के मिशन-2014 के लिए अहम साबित हो सकती हैं।

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