कितना बदलेंगे भारत-ईरान

नई दिल्ली Updated Tue, 26 Nov 2013 07:52 PM IST
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How much change India and Iran

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अमेरिकी दबाव में यूपीए सरकार ने ईरान से अपने रिश्ते जिस हद तक बिगाड़ लिए थे, उस पृष्ठभूमि में यह थोड़ा संतोषजनक है कि जिनेवा में हुए समझौते की रूपरेखा तय करने में भारत की भी थोड़ी-बहुत भूमिका रही है।
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इस दौरान ईरान के उप-विदेश मंत्री की भारत यात्रा को भी रेखांकित किया जा सकता है, जिसमें भारत और ईरान के रिश्तों को नई ऊंचाई पर ले जाने का संकल्प दिखता है। ईरान के बाद सर्वाधिक शिया मुसलमान भारत में ही हैं।
समझौते के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत घटी, तो अपने यहां भी रुपये और शेयर बाजार में मजबूती दिखी, पर फिलहाल ये शुरुआती संकेत ही हैं। चूंकि अगले छह महीने तक तेल निर्यात, शिपिंग या बैंकिंग के क्षेत्र में ईरान को कोई खास छूट नहीं मिलने वाली, ऐसे में, भारत समेत किसी भी देश को कच्चे तेल के मामले में कोई तात्कालिक राहत नहीं मिलने वाली।
हां, यह घटनाक्रम दूसरी कई वजहों से भारत के लिए जरूर फायदेमंद है। एक तो यही कि पड़ोस में एक और देश के परमाणु शक्तिसंपन्न होने का खतरा टल गया है। ईरान परमाणु हथियार बनाने का रास्ता छोड़ता है, तो पाकिस्तान पर भी अंधाधुंध ढंग से परमाणु हथियारों का जखीरा जमा करने के खिलाफ नैतिक पाबंदी आयद होगी।

ईरान से हमारे रिश्ते बेहतर हुए, तो अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक भारतीय पहुंच आसान होगी; अगले वर्ष काबुल से अमेरिकी फौज की विदाई को देखते हुए यह महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। इसके अलावा ईरान के मुख्यधारा में लौटने से पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन स्थापित होगा, जो अब तक सऊदी अरब के पक्ष में झुका हुआ था।

चूंकि ईरान से तेल मंगाना हमारे लिए किफायती है, इसलिए दीर्घावधि में वहां से हमारा तेल आयात बढ़ने के अलावा गैस पाइपलाइन परियोजना में भी हमारी भागीदारी संभव हो सकती है। लेकिन यह सारा कुछ इस पर निर्भर करेगा कि अमेरिकी संसद में इस समझौते के विरोधी तथा इस्राइल और सऊदी अरब जैसे मुल्क आगे क्या रणनीति अख्तियार करते हैं।

चूंकि विगत में हमने ईरान के खिलाफ वोटिंग करने के अलावा तेल आयात में भी भारी कटौती की थी, ऐसे में, तेहरान हमारे प्रति कैसा रुख अख्तियार करता है, यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा।
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