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उम्मीदें और हकीकत
अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Wed, 20 May 2015 08:24 PM IST
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किसी सरकार के लिए एक वर्ष का समय बहुत नहीं होता, लेकिन मोदी सरकार जिन वायदों, नारों और इरादों के साथ सत्ता में आई थी, उससे लोगों की अपेक्षाएं काफी बढ़ गई थीं। लिहाजा सरकार के एक वर्ष के कामकाज को अर्थशास्त्री से लेकर आम आदमी तक अपनी-अपनी कसौटियों पर कस रहे हैं। रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन का कहना है कि मोदी सरकार से जो उम्मीदें पाली गई थीं, वे अवास्तविक थीं।
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यदि उनके बयान की तह में जाएं, तो काफी हद तक यह सच भी लगता है। असल में यूपीए सरकार के अंतिम कुछ वर्ष बेहद निराशा में बीते थे, जिसमें निवेशकों के साथ ही आम लोगों तक का सरकार से भरोसा उठ चुका था। जब अर्थव्यवस्था पटरी से उतरी हुई थी, महंगाई दो अंकों के आसपास थी और कोयला और 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले के कारण यूपीए अपनी लोकप्रियता के सबसे न्यूनतम स्तर पर था; तब मोदी ने लोगों में उम्मीदें जगाईं। हालत यह हो गई कि लोकसभा चुनाव में मोदी का दिया यह सहज-सा नारा ही सरकार बदलने के लिए पर्याप्त हो गया कि 'अच्छे दिन आने वाले हैं!' वास्तव में मोदी सरकार के आने के बाद सबसे बड़ा बदलाव धारणा के स्तर पर ही दिखा और खासतौर से बाजार और निवेशक सबसे अधिक उत्साहित थे।
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राजन के मुताबिक मोदी सरकार ने निवेश का माहौल तैयार करने में मदद की और वह निवेशकों की चिंता के प्रति संवेदनशील है। मगर, दूसरा पहलू यह भी है कि अब भी ऐसी अनेक बाधाएं हैं, जिनकी वजह से अर्थव्यवस्था को वह गति नहीं मिल सकी है, जिसकी अपेक्षा थी। मसलन, यही देखा जा सकता है कि अब तक कुछ बैंकों ने ही रिजर्व बैंक की दरों में की गई कटौती का लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचाया है। टैक्स रिफॉर्म की बातें भी काफी की गईं, लेकिन जीएसटी का मामला लटका हुआ है। यही हाल भूमि अधिग्रहण विधेयक का है, जिस पर निवेशकों की नजर है।
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राजन ने यह भी कहा है कि इस सरकार में बाजार विरोधी ताकतों को ध्वस्त करने की क्षमता है; लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि सिर्फ बाजार के भरोसे रहने वाली सरकारें अपना मानवीय चेहरा खो देती हैं। मोदी सरकार की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह निवेशकों का भरोसा कायम करने के साथ ही आम लोगों की आकांक्षाओं के बीच किस तरह संतुलन कायम करती है।