इससे किसका मान बढ़ेगा
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प्रधानमंत्री की मौजूदगी में मुख्यमंत्रियों की हूटिंग की कई घटनाएं दुर्भाग्यपूर्ण और संघीय ढांचे को चोट पहुंचाने वाली हैं। हालांकि इन्हें भाजपा की जीत के परिप्रेक्ष्य में भी देखना चाहिए। केंद्र में पूर्ण बहुमत से आई एनडीए सरकार के प्रति जनता की उम्मीदें स्वाभाविक ही अधिक हैं। लोग नरेंद्र मोदी को सुनना भी चाहते हैं। उनकी मौजूदगी में विपक्षी मुख्यमंत्री जिस अनुभव से दो-चार हो रहे हैं, विगत चुनाव अभियान में भाजपा के कई वरिष्ठ नेता ऐसी ही स्थिति का सामना कर चुके हैं। इसलिए कांग्रेस ने अपने मुख्यमंत्रियों को प्रधानमंत्री के साथ मंच साझा न करने का जो सुझाव दिया, वह प्रोटोकॉल के उल्लंघन के अलावा कांग्रेस की हताशा का भी नमूना है। उसे अपने ही मुख्यमंत्री के सिद्धरमैया से सीखना चाहिए, जिन्होंने प्रोटोकॉल का पालन करने की प्रतिबद्धता जताई है।
अलबत्ता मुख्यमंत्रियों को उनके ही राज्य में असहज करने की घटनाएं गंभीर हैं और कहा जा रहा है कि यह प्रधानमंत्री के सरकारी कार्यों के राजनीतिकरण की कोशिश है। जहां विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, वहीं प्रधानमंत्री का कार्यक्रम और विरोधी दलों के मुख्यमंत्रियों के साथ यह सुलूक क्या संयोग है? यह कोई नहीं मानेगा कि ये घटनाएं प्रधानमंत्री के निर्देश पर हो रही हैं। रांची में उन्हें लोगों को रोकते देखा ही गया। मुख्यमंत्री रहते हुए वह केंद्र के रवैये के आलोचक थे, इसीलिए उन्हें ऐसी प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने की कोशिश करनी ही चाहिए।
पर भाजपा नेता हूटिंग की आलोचना करने के बजाय विरोधी मुख्यमंत्रियों को जिस तरह निशाने पर ले रहे हैं, वह दुखद है। वे भूलते हैं कि दिवंगत ज्योति बसु ने मुख्यमंत्री रहते हुए कोलकाता में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ मंच साझा नहीं किया था, पर वाजपेयी ने तब बड़प्पन का परिचय दिया था, और भाजपा ने भी उसे मुद्दा नहीं बनाया था। और अब भी प्रकाश सिंह बादल जैसे उन्हीं के सहयोगी मुख्यमंत्रियों की हूटिंग को अलोकतांत्रिक बता रहे हैं। अपने उत्साह पर नियंत्रण रखते हुए भाजपा को समझना होगा कि उसे पांच साल सरकार चलानी है और जीएसटी जैसे कई बड़े फैसले करने हैं, जो राज्य सरकारों को साथ लिए बिना संभव नहीं।