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सबके सिर पर छत
अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Thu, 18 Jun 2015 08:53 PM IST
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वर्ष 2022 तक सबके लिए आवास योजना को मंजूरी देकर सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है, इसमें संदेह नहीं। आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने इसके अलावा खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य भी बढ़ाए हैं, जिनमें खासकर दाल और तिलहन के उत्पादन को प्रोत्साहित करने का फैसला उल्लेखनीय है। अलबत्ता 'सबके लिए घर' ज्यादा महत्वाकांक्षी फैसला है, जिससे समाज के कमजोर लोगों को लाभ तो होगा ही, सुस्त पड़े रीयल एस्टेट क्षेत्र को भी गति मिलने की उम्मीद बनी है।
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इस योजना के केंद्र में आर्थिक रूप से कमजोर और कम आय वाले वे दो वर्ग हैं, जिन्हें खासकर शहरी भारत में बेहद मुश्किलों में रहना पड़ता है। कभी रोटी, कपड़ा और मकान न सिर्फ एक प्रभावी नारा था, बल्कि सरकारों से यह उम्मीद की जाती थी कि वे प्रत्येक नागरिक की इन मूलभूत जरूरतों को पूरा करेंगी। लेकिन बढ़ती महंगाई को देखते हुए सिर पर छत सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि मनुष्य की अपनी चिंता बनकर रह गई। नई अर्थनीति ने सरकार की कल्याणकारी भूमिका को भी सीमित कर दिया। आर्थिक उदारीकरण के बाद हमारे यहां रीयल एस्टेट क्षेत्र में जो भारी उछाल आया, वह मूलतः मध्य और उच्च मध्यवर्ग पर केंद्रित था। समुचित योजना के अभाव के कारण हुआ यह कि एक तरफ फ्लैट उत्तरोत्तर महंगे होने के कारण निवेश का साधन भी बने, दूसरी ओर, निम्न मध्यवर्ग के लोगों को सस्ता घर मुहैया कराने की दिशा में गंभीरता से नहीं सोचा गया।
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ऐसे में, अगले पंद्रह वर्षों तक होम लोन पर 6.5 फीसदी ब्याज सब्सिडी देने के सरकार के ताजा फैसले से आर्थिक रूप से कमजोर लोगों का अपने घर का सपना पूरा हो सकता है। बेशक यह फैसला सरकार की आर्थिक सेहत के अनुकूल नहीं है; आगे ब्याज दर बढ़ने की स्थिति में उस पर सब्सिडी का बोझ और भी बढ़ सकता है। लेकिन आर्थिक रूप से तरक्की कर रहे देश की छवि के लिए यह ठीक नहीं कि उसके सभी नागरिकों के सिर पर छत न हो। बेशक कमजोर वर्ग के लिए पूर्व में शुरू की गई आवासीय योजनाएं कई बार भ्रष्टाचार के कारण उद्देश्य में सफल नहीं हो सकीं। पर इसी सरकार ने प्रमाणपत्रों के स्वयं सत्यापन की व्यवस्था शुरू की है, इसलिए भी आशा बंधती है कि यह योजना भ्रष्ट व्यवस्था का शिकार नहीं होगी।
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