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हिंदी का मूर्तिभंजक
नई दिल्ली
Updated Tue, 29 Oct 2013 08:15 PM IST
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राजेंद्र यादव के निधन से हिंदी की दुनिया थोड़ी और अकेली, थोड़ी और उदास हो गई है। हिंदी की पुरानी पीढ़ी के लिए उनका जाना अगर नई कहानी के आखिरी शिखर का टूटना है, तो परिदृश्य पर मौजूद नई पीढ़ी उनके देहांत को एक ऐसी शख्सियत के रूप में याद रखेगी, जिसने न लिखते हुए भी अपनी पत्रिका के जरिये हिंदी की दुनिया में कदाचित सबसे ज्यादा जगह घेरे रखी।
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हिंदी पट्टी को भोजनभट्टों का इलाका कहकर हंसी उड़ाने वाले और हनुमान को पहला आतंकवादी कहने का साहस रखने वाले हिंदी के इस मूर्तिभंजक को जितना विरोध सहना पड़ा, उनके खुद का लोकतांत्रिक आचरण उतना ही चकित करने वाला था। जिस दौर में साहित्य अपने आसपास से कट गया है, उस समय राजेंद्र यादव आखिरी मेजबान थे, जो सामने बैठे असहमत मेहमान को भी आत्मीयता के साथ सुनने का धैर्य रखते थे।
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उनके स्वच्छंद व्यक्तित्व ने आलोचक पैदा किए, तो उन्हें सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करने वाले भी कम नहीं थे। राजेंद्र यादव की शुरुआती कृति सारा आकाश इस अर्थ में एक चमत्कृत कर देने वाली रचना थी, जिसमें पत्नी की परिवार में हो रही उपेक्षा को उसका युवा पति अपने प्रेम और भावुकता से धोने की कोशिश करता है। इस पर बहस हो सकती है कि अपने समकालीन कथाकारों जैसी रचनात्मक कौंध और वैविध्य उनकी कहानियों में था या नहीं, लेकिन बाद में अपने लेखन की सीमा को हंस का संपादन करते हुए अपनी शक्ति में उन्होंने जिस तरह बदला, हिंदी में उसके उदाहरण कम मिलेंगे।
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पिछले करीब तीन दशकों में हिंदी की जो भी रचनात्मक उपलब्धियां हैं, उनमें हंस का योगदान सर्वाधिक रहा है। कहानी को केंद्र में लाने में यह पत्रिका सफल हुई, तो इसकी वजह राजेंद्र यादव की संपादकीय दृष्टि थी। जनचेतना के इस प्रगतिशील कथा-मासिक ने नए कथाकार पैदा किए, श्रेष्ठतम विदेशी कहानियों से हिंदी पाठकों को परिचित कराया, तो स्त्री और दलितों को हाशिये से उठाकर साहित्यिक विमर्श के केंद्र में भी स्थापित किया। इस दौरान हंस ने जो भी मुद्दे उठाए, वे हिंदी के समकालीन मुद्दे बन गए। उनकी गैरमौजूदगी में हंस शायद जी जाए, पर उसमें नीर-क्षीर विवेक की वैसी क्षमता रहेगी, इसमें संदेह है।