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यहां विचार की कमी है

Wed, 02 Apr 2014 07:17 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Wed, 02 Apr 2014 07:17 PM IST
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Here lack of thought.

चुनाव के समय राजनीतिकों के बीच तीखी बयानबाजी कोई नई बात नहीं है, मगर व्यक्तिगत स्तर पर की जा रही अशोभनीय टिप्पणियों से समझा जा सकता है कि आखिर आम लोगों के बीच राजनीतिक वर्ग की छवि खराब क्यों है। यह तलाश बेमानी है कि इसकी शुरुआत कैसे हुई; गौर करने वाली बात यह है कि जिस तरह से भाषा की मर्यादा लांघी जा रही है, वह कोई अच्छा संकेत नहीं है। और ऐसी टिप्पणियां करने में किसी भी दल के नेता पीछे नहीं हैं।

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बेनी प्रसाद वर्मा और आजम खान ने हाल ही में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के लिए जिन शब्दों का इस्तेमाल किया, उन्हें यहां नहीं दोहराया जा सकता, तो कांग्रेस उम्मीदवार इमरान मसूद का एक ऐसा वीडियो भी सामने आया, जिससे पता चलता है कि हमारे नेता किस हद तक जा सकते हैं! दूसरी ओर खुद मोदी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के विदेशी मूल पर टिप्पणी करने से गुरेज नहीं करते, जबकि सर्वोच्च अदालत के फैसले के बाद उनकी नागरिकता का मसला खत्म हो चुका है। यही नहीं, कुछ महीने पहले उन्होंने गुजरात दंगों के सिलसिले में मुस्लिमों से संबंधित एक सवाल के जवाब में कुत्ते के पिल्ले जैसे रूपक का इस्तेमाल कर इस बहस को एक अलग दिशा देने की कोशिश की थी। बात यहीं तक सीमित नहीं है, मुंबई में शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के झगड़े में उद्धव और राज ठाकरे शायद यह भूल चुके हैं कि वे दोनों न केवल रिश्ते में भाई हैं, बल्कि कभी एक साथ हुआ करते थे।
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चिंता की बात यह है कि नेताओं की यह जुबानी जंग सोशल मीडिया के जरिये उस स्तर पर चली गई है, जिसमें मर्यादा जैसे शब्द के लिए कोई जगह नहीं है। ऐसी अभद्र टिप्पणियां नेता पहले भी करते रहे हैं, मगर अब चूंकि वे चौबीसों घंटे मीडिया और चुनाव आयोग की नजर में होते हैं, इसलिए उनकी टिप्पणियां तेजी से सबके सामने आ जाती हैं।
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यह समझने की जरूरत है कि चुनावी विमर्श के मुद्दे तय करना चुनाव आयोग का काम नहीं है, यह पहल तो राजनीतिक वर्ग को ही करनी चाहिए। मगर यदि दिवंगत कवि श्रीकांत वर्मा की सुप्रसिद्ध कविता-कोसल में विचार की कमी है- के शब्दों को थोड़ा बदलकर कहें, तो ऐसा लगता है कि हमारे राजनीतिक वर्ग के पास भी विचार की कमी है।

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